दरस दे प्रभु दरस दे ।

गेल्या वर्षभरात करोनाच्या वाढत्या प्रादुर्भावामुळे अथवा स्वतः किंवा जवळचे कोणी संक्रमित झाल्यामुळे माणिकनगरला येण्याच्या अनेक संधी हुकल्या. ठरवलेले बेत रद्द करावे लागले, काढलेली तिकिटे रद्द करावी लागली. प्रभु नगरी येऊन प्रभु सेवा करण्याच्या संधी हातातून अचानक निसटून गेल्या. आता तिथे वेदांत उत्सव चालू असताना ह्याची सल अधिकच जाणवते आहे. ही परिस्थिती लवकरात लवकर सुधारून माणिकनगरला येण्याचा लवकरच योग यावा अशी विनम्र प्रार्थना करीत ही कविता प्रभु चरणी अर्पण करते.

विरह-वेला में व्यथित मन

तव स्मरण में है मगन ।

दरस दे प्रभु दरस दे ।।

 

चरण सेवा का सुअवसर

मुझे शीघ्र प्रदान कर ।

दरस दे प्रभु दरस दे।।

 

आ सकूं मैं तेरे द्वारे

नष्ट हों अब विघ्न सारे ।

दरस दे प्रभु दरस दे।।

 

कान मेंरे नित तरसते

भजन की धुन सुरस दे।

दरस दे प्रभु दरस दे।।

 

तव चरण में शीश मेरा

हो सदा आशीष तेरा ।

दरस दे प्रभु दरस दे।।

फाल्गुन पौर्णिमा प्रवचन

आज रविवार २८-०३-२०२१ फाल्गुन पौर्णिमा के अवसर पर श्रीजी के आशीर्वचन का प्रसारण हमारे YouTube Channel “Manik Prabhu”  पर किया गया है। आप सभी अध्यात्मप्रेमी भक्तजनों से निवेदन है कि इस प्रवचन को आत्मसात्‌ कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर होली के त्यौहार को सार्थक करें।

श्री हनुमंत दादा महाराज का पुण्यस्मरण

श्रीप्रभु के अग्रज श्री हनुमंत दादासाहेब महाराज की १५९वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आज संगम में स्थित उनके समाधि मंदिर में विशेष पूजा संपन्न हई।

प्रभु चरित्र में दादासाहेब महाराज के जन्म एवं बाल्यकाल का जो वर्णन है वह अत्यंत विस्मयकारक है। बचपन में उनका जो वर्तन था उसे देखकर लोगों को उसी समय उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचय हो गया था। एकांतप्रिय दादा साहेब का जीवन पहले से ही वैराग्यमय रहा। जन्म से लेकर उपनयन तक वे मौन रहे इसलिए सब उन्हें गूंगा समझते थे परंतु उपनयन के समय जैसे ही उनके कानों में गायत्री मंत्र का उपदेश हुआ वे बोलने लगे। ऐसी विचित्र घटनाओं ने एवं दादा साहेब के स्वभाव ने लोगों को तो आश्चर्यचकित किया था परंतु उनके पिता अपने पुत्र के सामर्थ्य से भली-भांति परिचित थे। पहले तो लोग कहते थे, कि मनोहर नाईक का कैसा दुर्भाग्य है जो इनको ऐसा, न बोलने वाला और न हंसने वाला बच्चा जन्मा है। परंतु श्रीप्रभु के जन्म के बाद सबको यह बात समझ आ गई थी, कि यह सब प्रभु के अवतार से जुड़ी हुई पूर्वनिर्धारित योजनाओं के अनुसार हो रहा है।

बाहर से देखने वालों को मनोहर नाईक के तीन पुत्र भले ही अलग-अलग दिखते हों परंतु वास्तव में प्रभु के दोनों बंधु उन्हींके विराट अवतार के अभिन्न भाग थे। भगवान्‌ जब अवतार लेते हैं, तब अकेले नहीं आते। अपने संग सहकारियों को लेकर आते हैं और इन सहकारियों की सहायता से प्रभु अपने अवतार कार्य को पूर्ण करके निजधाम लौट जाते हैं। जैसे भगवान्‌ राम का कार्य और उनका जीवन हनुमानजी एवं लक्ष्मणजी के अवतार के बिना असंभव था, जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण का कार्य अर्जुन तथा बलरामजी के सहकार्य के बिना अधूरा ही होता उसी तरह श्रीप्रभु का अवतार और उनका कार्य उनके दोनों बंधुओं के सहकार्य से ही सफल हुआ। इसलिए श्रीप्रभु के अवतार को अलग से न देखते हुए हमें यह समझना होगा कि श्रीप्रभु अपने दोनों बंधुओं साथ में लेकर प्रगट हुए। इसी बात को श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज श्रीप्रभु की आरती में कहते हैं: नरहरी मोहनिशि हरी दुष्टगज हरी अनुज हो त्याचा। ज्या वर्णनी थकली शेष बृहस्पति वाचा। हनुमंत सहित गुरु त्रिगुण मूर्ति प्रगटवी। जय प्रताप श्री यश भक्तां वाढवी।। महाराजश्री कहते हैं, अपने दोनों बंधुओं समेत श्रीप्रभु का जो अवतार हुआ है वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार के समान संयुक्त अवतार है। ऐसा कहने का एक और कारण यह है, कि श्रीप्रभु ने अपनी समाधि से पहले अपने दोनों बंधुओं को निजधाम भेजा और फिर स्वयं समाधिस्त हुए। ठीक वैसे ही, जैसे कोई वाहन चालक सभी यात्रियों को गाडी में बिठाने के बाद ही खुद आखिर में गाडी पर सवार होता है।

जिन लोगों ने प्रभु चरित्र पढ़ा है, वे जानते हैं, कि श्रीप्रभु के कार्य को सफल बनाने में दादा महाराज तथा तात्या महाराज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। सन्‌ १८४५ में श्रीप्रभु ने माणिकनगर की स्थापना की और उस समय प्रभुमहाराज ने नगर व्यवस्था तथा सभी योजनाओं को मूर्तरूप देने का कार्यभार दादा महाराज के ही कंधों पर सौंपा था। उन दिनों तात्या महाराज कल्याण के नवाब की कचहरी में कार्यरत थे इसलिए संस्थान की व्यवस्था से लेकर सभी अन्य छोटे-बड़े प्रबंध करने का उत्तरदायित्व दादा महाराज ने सम्हाला था। यद्यपि यह सारे कार्य उनके स्वभाव और रुचि से विपरीत थे तथापि उन्होंने प्रभु द्वारा उनपर सौंपा हुआ उत्तरदायित्व अत्यंत दक्षता से पूर्ण किया। माणिकनगर पधारने वाले प्रत्येक सद्भक्त की व्यवस्था यथोचितरीति से होती थी परंतु उनमें जो वृद्ध जन और छोटे बच्चे होते थे उनपर दादा महाराज का विशेष ध्यान रहता था। प्रभु के दरबार में पधारे भक्तजनों को उनके वास्तव्य के दौरान यहॉं किसी भी प्रकार की कोई असुविधा न हो इसका वे विशेष ध्यान रखते थे। प्रभु दर्शनार्थ माणिकनगर आए भक्तजनों के छोटे बच्चों को दिन में दो बार दूध मिले ऐसी व्यवस्था उन्होंने की थी और वे स्वयं बड़ी बारीकी से इस बात का ध्यान रखते थे। आज माणिकनगर में विद्यमान श्री शिवपंचायतन्‌ देवालय तथा ग्रामस्थ हनुमान मंदिर का निर्माण दादा महाराज के ही कुशल नेतृत्व में पूर्ण हुआ है। कालांतर में श्रीप्रभु के अनुज श्री नृसिंह तात्या महाराज ने श्रीसंस्थान का कार्यभार सम्हाला और दादा महाराज अपने जप-तप अनुष्ठान में अधिक समय बिताने लगे।

दादा महाराज को हठयोग विद्या में प्राविण्य प्राप्त था और वे श्रीविद्या के पहँचे हुए उपासक थे ऐसा चरित्र में पढकर हमें ज्ञात है। परंतु वास्तव में उनकी योग्यता और उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य का आकलन करने का प्रयास यदि हम करें तो उसे नादानी ही कहना होगा। दादा महाराज जैसे श्रेष्ठ योगी को श्रीप्रभु जैसे महान्‌ संत अनुज के रूप में प्राप्त थे। इससे बढिया संयोग और क्या हो सकता है? जिस समय दादा महाराज को यह संकेत मिला, कि जिस महान कार्य के लिए उनका जन्म हुआ था अब वह परिपूर्ण हो रहा है और उनके दिव्य जीवन का उद्देश्य भी पूर्ण हो चुका है, तब वे श्रीप्रभु के पास गए। कहते हैं, कि तीन दिनों तक दादा महाराज और श्रीप्रभु एकांत में रहे। अब इस बीच उनमें क्या चर्चा हुई, क्या बातचीत हुई और क्या घटित हुआ यह विषय हम जैसे कच्चे बुद्धि वाले सामान्य जीवों की समझ के बाहर का विषय है। श्रीप्रभु की अनुज्ञा से दादा महाराज ने यह निश्चित किया था, कि नियोजित तिथि को वे अपनी जीवन यात्रा को विराम देंगे। इस अनपेक्षित समाचार से माणिकनगर के वातावरण में एक गंभीरता छा गई और सबके मन दुःख से भर गए।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा के दिन दादा महाराज ने शास्त्र के आदेशानुसार अपने माता की आज्ञा लेकर श्रीप्रभु चरणों की अनुज्ञा ली और समाधि विधि को आरंभ किया। स्वयं प्रभु महाराज अपनी देखरेख में विद्वान पंडितों द्वारा धार्मिक विधि संपन्न करवा रहे थे। माणिकनगर में हज़ारों की संख्या में एकत्रित हुए स्त्री-पुरुष भारी मन से इस अलौकिक घटना के दर्शन कर रहे थे। कुछ क्षणों के लिए ही सही परंतु वहॉं उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को महाराजश्री ने वैराग्य के रंग से सराबोर कर दिया था। इस दृष्य को देख रहे प्रत्येक व्यक्ति की आंखें आंसुओं से डबडबाई हुईं थीं परंतु चिदानंद में निमग्न दादा महाराज का चेहरा ब्रह्मतेज के लावण्य से निखर रहा था। शास्त्रानुसार दादा महाराज ने सन्यास आश्रम स्वीकार किया और महाप्रयाण के लिए आसन पर सिद्ध हुए। साधू, बैरागी और फकीरों की बड़ी भीड़ यह अनुपम दृष्य देखने के लिए माणिकनगर में उपस्थित थी। दादा महाराज ने अंतिम बार श्रीप्रभु की अनुज्ञा ली और आसन जमाकर बैठे। भजन और मृदंग के तुमुल निनाद के बीच दादा महाराज ने आंखें मूंदीं और योगमार्ग के अवलंब से ब्रह्मरंध्र का भेदन कर प्राणज्योति को प्रभुचरणों में लीन किया। प्राणोत्क्रमण के पश्चात्‌ महाराजश्री के पार्थिव देह को फूलों से सजाई हुई पालखी में रखकर भक्तजन, भजन और जयघोष के बीच संगमस्थित उनके समाधिस्थल पर पहुँचे। श्रीप्रभु के समर्थ नेतृत्व में दादा महाराज की समाधि का विधान विधिवत्‌ पूर्ण हुई और कालांतर में श्रीप्रभु ने ही समाधि स्थान पर एक सुंदर देवालय का निर्माण करवाया।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा (शनिवार १ मार्च १८६२) का दिन श्री हनुमंत दादा साहेब महाराज के पुण्यस्मरण का पर्व है। प्रतिवर्ष इस दिन, संगम में स्थित उनकी समाधि की महापूजा एवं आराधना संपन्न की जाती है। श्री दादा साहेब महाराज का जीवन एवं उनका कार्य हमें सदा श्रीप्रभु चरणों की सेवा में समर्पित रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। उस दिन भले ही महाराजश्री का देह पंचतत्त्वों में लीन हो गया हो परंतु उनकी कीर्ति सुगंध के रूप में आज भी इस नगर के वातावरण में प्रवाहित हो रही है। उस सुगंध से हमारा जीवन प्रभुमय हो ऐसी कामना करते हुए महाराजश्री की पुण्यतिथि के अवसर पर हम कृतज्ञतापूर्वक उनके चरणों में नमन अर्पित करते हैं।

महाशिवरात्रि पर श्रीजी का आशीर्वचन

आज गुरुवार 11-03-2021 महाशिवरात्रि के अवसर पर सायंकाल ठीक 6:00 बजे श्रीजी के आशीर्वचन का प्रसारण हमारे YouTube Channel “Manik Prabhu” तथा Facebook Page “Shri Manik Prabhu Maharaj” पर किया जाएगा। आप सभी अध्यात्मप्रेमी भक्तजनों से निवेदन है कि इस प्रवचन को आत्मसात्‌ कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर महाशिवरात्रि के व्रत को सार्थक करें।

श्रीमाणिक क्षेत्र दर्शन

प्रभुचरणों के दिव्य स्पर्ष से पुलकित है जो स्थान।
उस नगरी की महिमा का अब आओ सुनें बखान।।

अनुपम अद्भुत अद्वितीय है प्रभु का यह दरबार।
इसकी तुलना में फीका पड़ता सारा संसार।
श्रीसमाधि के दर्शन से मिटते सब क्लेश विकार।।
सकलमतस्थापक श्रीप्रभु की बोलो जयजयकार।।

गुरुगंगा विरजा संगम है शिष्य-गुरु का मिलाप।
इस संगम के दर्शन से ही धुल जाते सब पाप।
दंडपाणि सर्वेश्वर शिव हरते हैं भव भय ताप।
यम भी कांपे थर-थर सुनकर इनका शौर्य प्रताप।।

औदुंबर की छाया में श्रीदत्त का सन्निधान।
शब्द नहीं कर सकते इनकी महिमा का गुणगान।
कल्पवृक्ष प्रभु संप्रदाय का सुंदर सघन विशाल।
इसकी छाया में जो-जो बैठे वो हुए निहाल।।

सदा अन्नपूर्णा माता का रहता यहॉं निवास।
होती है इनके प्रसाद में अद्भुत दिव्य मिठास।
पंचमूर्ति शिव श्रीनारायण दुर्गा सूर्य गणेश।
शीघ्र तुष्ट होकर करते भक्तों पर कृपा विशेष।।

भक्तों की रक्षाहित तत्पर वीर सुभट हनुमंत।
रामनाम जपने वालों से करते प्रेम अनंत।
शरणागत की विपदाओं का क्षण में करते अंत।
इनके आश्रय में निर्भय सब साधू संत महंत।।

प्रभुनगरी का शक्तिपीठ यह अति जाज्ज्वल्य महान्‌।
आदिशक्ति मधुमती श्यामला व्यंकम्मा का स्थान।
व्यंका माता दीन जनों की एकमेव आधार।
आश्रित प्रभु भक्तों के करतीं सभी स्वप्न साकार।।

कोतवाल प्रभुनगरी के कालाग्निरुद्र हनुमान।
रिपुओं का निर्दालन करना इनका कार्य प्रधान।
अपने कंधों पर ढोते हम भक्तों का अभिमान।
रखें सुरक्षित नगरजनों की आन बान औ शान।।

मल्लारी मार्तंड हमारे मणिगिरि के सम्राट।
दुष्ट दमनहित हुए अवतरित धरकर रूप विराट।
ज्ञानखड्ग की आभा का फैला सर्वत्र प्रकाश।
येळकोट के गर्जन से गूंजे सारा आकाश।।

यही हमारी काशी मथुरा यह है गोकुल ग्राम।
यह अवंतिका यही अयोध्या यहीं हमारे राम।
सकलतीर्थ हैं बसे यहॉं, यह प्रभु का पावन धाम।
इधर उधर मत भटको भाई करो यहीं विश्राम।।

दिव्य अनोखे इस नगरी के जाग्रत देवस्थान।
नित नियमित दर्शन से होता भक्तों का कल्याण।
अलग अलग विग्रह प्रतिमाऍं नाम रूप पहचान।
छिपा हुआ सबके भीतर चैतन्य एक भगवान्‌।।

चैतन्यराज प्रभु

श्रीमत्कालाग्निरुद्र स्थापना पर्व

माणिकनगर में श्रावणमास का अनुष्ठान चल रहा था। श्रीमन्मार्तंड माणिकप्रभु महाराज रात्रि के समय श्री प्रभु समाधि की प्रदोषपूजा संपन्न कर रहे थे। अचानक उन्हें प्रभु समाधि पर गिरनेवाले प्रकाश का आभास हुआ। उन्होंने जब महाद्वार की ओर देखा तो पाया कि वह प्रकाश संगम में जल रही चिता का था। चिता की अग्नि का प्रकाश प्रभुसमाधि पर गिरे, यह योग्य नहीं था। अतएव पूजा समाप्त होने पर उन्होंने संस्थान के तत्कालीन कार्यवाह श्री शंकरराव दीक्षित (श्री शंकर माणिकप्रभु) को बुलवाकर आज्ञा दी कि प्रभुमंदिर के सामने स्थित महाद्वार और संगम में स्थित स्मशान के बीच एक पश्चिमाभिमुख मंदिर बनवाया जाए  ताकि स्मशान में जलनेवाली चिता का अमंगल दृष्य प्रभु मंदिर से दिखाई न पड़े। महाराजश्री की आज्ञानुसार मंदिर का निर्माण हो गया तथापि उस मंदिर में स्थापित करने के लिए देवता के विग्रह का प्रबंध नहीं हुआ था। तभी श्रीजी ने व्यवस्थापकों को बताया, कि भंडारखाने के पीछे प्रभु मंदिर के निर्माण के समय से कुछ पत्थर पड़े हैं और उन शिलाओं में खोजने पर शायद किसी देवता की मूर्ति मिल जाए। श्रीजी की इस आज्ञानुसार जब उस स्थान पर पत्थरों के टीले को हटाया गया तो वहॉं काले पाषाण में तराशी हुई हनुमानजी की एक अत्यंत सुंदर मूर्ति मिली। इ. स. 1916 के माघ मास में त्रयोदशी के दिन श्रीजी ने महाद्वार के ठीक सामने बने नए मंदिर में हनुमानजी की इस मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा अत्यंत वैभवपूर्ण रीति से संपन्न की। प्राणप्रतिष्ठा के अवसर पर श्रीजी ने यह घोषित किया, कि यहाँ विराजित हनुमान आज से कालाग्निरुद्र के नाम से जाने जाऍंगे।

सप्ताग्न्यष्टैकशाके शुभविबुधदिने माघशुक्लप्रदोषे।
कर्के चन्द्रे सुलग्ने नतजनसुखदो योगिराजाधिराजः।
श्रीमन्मार्तण्डराजोऽखिलविबुधगणैर्वैदिकैर्मन्त्रघोषैः।
वीरं कालाग्निरुद्रं सकलसुखकरं स्थापयामास सम्यक्।।

शके १८३७ माघ शुक्ल त्रयोदशी बुधवार (16 फेब्रुवरी 1916) के दिन नम्र हुए भक्तों को सुख प्रदान करनेवाले योगियों के सम्राट् श्री मार्तण्ड माणिकप्रभु महाराज ने विद्वान् वैदिक पंडितों के मंत्रघोष के बीच सभी प्रकार के सुख प्रदान करनेवाले वीर कालाग्निरुद्र हनुमान् की विधिवत् स्थापना की।

प्राणप्रतिष्ठा के समय मूर्ति की नेत्रोन्मीलन विधि के अवसर पर श्रीजी ने मूर्ति के सम्मुख एक बड़ा दर्पण रखवाया और कहा कि यह कालाग्निरुद्र अत्यंत तेजस्वी हैं, उनकी दृष्टि अत्यंत प्रखर है, इसलिए नेत्रोन्मीलन विधि के समय कोई भी मूर्ति के सम्मुख न जाएँ। प्राणप्रतिष्ठा की विधि के लिए अनेक विद्वान् निमंत्रित किए गए थे, उनमें से एक उत्साही ब्राह्मण कौतुहलवश परदे को हटाकर अंदर झांकने लगा। कहते हैं कि हनुमानजी के नेत्रों के प्रखर तेज से तत्काल उसके उत्तरीय में आग लग गई जो किसी तरह बुझा कर शांत कर दी गई। श्रीजी ने बाद में उस ब्राह्मण को फटकार कर कहा कि कभी भी देवताओं की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए।

कालाग्निरुद्र हनुमान माणिकनगर के रक्षक (कोतवाल) एवं प्रहरी हैं। श्रीजी ने कालाग्निरुद्र की स्तुति में अत्यंत सुंदर काव्य की रचना करते हुए इन्हें ‘माणिक क्षेत्र अभिमान रक्षण दक्ष’ कहा है। कालाग्निरुद्र की स्तुति में कहा गया है:

ध्यायेत्कालाग्निरुद्रं कपिनिकरवरं वातजं धीवरिष्ठं
पिङ्गाक्षं वामहस्ताखिलदुरितहरं दक्षहस्तेष्टपोषम्।
न्यस्तं मार्तण्डराड्भिः स्तुतचरणयुगं मण्डितं रामनाम्ना
माणिक्यक्षेत्रमानं दधतमुरुहृदि स्वर्णगोत्राभगात्रम्।।

अर्थात्‌ सुवर्ण पर्वत की प्रभा के सम देहकांतिवाले एवं लालिमायुक्त भूरे नेत्रवाले, अत्यंत बुद्धिमान् व वानर समूह में सर्वश्रेष्ठ, वामहस्त से सर्व पापों का नाश करनेवाले एवं दक्षिण हस्त से भक्तजनों का पोषण करनेवाले, श्रीरामनाम ही जिनकी शोभा है ऐसे वायुपुत्र, श्रीमार्तण्ड माणिकप्रभु के द्वारा स्थापित, अपने विशाल हृदय में माणिकनगर क्षेत्र का अभिमान धारण करनेवाले ऐसे कालाग्निरुद्र हनुमान् का ध्यान सदा करना चाहिए।

आज दिनांक २५ फरवरी को १२५वे श्री कालाग्निरुद्र स्थापना दिवस के निमित्त मंदिर में हनुमानजी की महापूजा संपन्न की गई। इस अवसर पर भक्तजनों ने मिलकर भजन का आयोजन किया। कार्यक्रम के पश्चात्‌ सद्भक्तों ने महाप्रसाद का लाभ लिया।