श्रीप्रभु का विश्वरूप दर्शन..

प्रभु सर्वत्र व्याप्त है। उपनिषदों में भी कहा गया है ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म।` जो कुछ है वह सब प्रभु का ही स्वरूप है। इस ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में प्रभु बसा हुआ है। प्रभुचरित्र में कथा भी है, कि प्रभु ने बीदर नगर के भक्तजनों को अपने विश्वरूप का दर्शन दिया था। वे भक्तजन तो अत्यंत सौभाग्यशाली थे परंतु हमारा क्या? क्या हमें कभी प्रभु के दर्शन नहीं हो सकते?

बिलकुल हो सकते हैं और सदा होते भी हैं। श्रीदत्त जयंती महोत्सव के समय माणिकनगर आकर देखिए, आपको प्रभु के विश्वरूप के दर्शन अवश्‍य होंगे। यह महोत्सव हमें प्रभु की प्रभुता का, ऐश्वर्य का, सौंदर्य का एवं वैभव का परिचय देता है। अन्य समय पर सामान्यरूप से सर्वत्र व्याप्त प्रभु के विश्वरूप  दर्शन हमें श्रीदत्त जयंती महोत्सव के समय प्रकर्ष से होते हैं। इस महोत्सव के समय प्रभु की जाज्वल्य शक्ति का सर्वत्र ऐसा संचार होता है, कि माणिकनगर के वातावरण में एक विलक्षण ऊर्जा प्रवाहित हो जाती है। यही वह समय है, जब प्रभु अपने विराट् स्वरूप को प्रगट करता है और क्षण-प्रतिक्षण हमें दिखाई देता रहता है। सदा अव्यक्तरूप में रहनेवाला प्रभु इस महोत्सव के समय नाना माध्यमों से अपने दिव्य स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। इसीलिए अन्य समय की तुलना में श्रीदत्त जयंती महोत्सव के समय प्रभु के सगुणरूप के दर्शन पाना अत्यंत सहज एवं सुलभ है।

श्रीदत्त जयंती महोत्सव के समय माणिकनगर पधारने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रभुस्वरूप है किंबहुना प्रभु ही भक्त बनकर इस उत्सव में सम्मिलित होता है। वह प्रभु ही है जो बच्चों का रूप धरकर उत्सव में लगे मेले का लुत्फ उठाता है। वह बूढ़ा आदमी भी प्रभु ही है, जो ठंड में किसी अंगीठी के समीप बैठकर ठिठुरता है। मेले में पागल का वेश धरकर अपनी उटपटांग हरकतों से लोगों का मनोरंजन करने वाला भी प्रभु ही है। बाज़ार में घूमने वाला वह भिखारी भी प्रभु है जो दिनभर यात्रियों से दुत्कार खाता रहता है। वह मिठाई बेचने वाला भी प्रभु स्वरूप है और आकाश में आनंद से मिठाइयाँ उछालने वाला भी प्रभु ही है और ज़मीन पर गिरी उन मिठाइयों को अपने मित्रों से छीना झपटी करके चुनने वाला बालक भी प्रभु है। पानी को केवल अपने स्पर्श से तीर्थ बनाने वाला भी प्रभु है और उस तीर्थ में डुबकी लगाने वाला भी प्रभु ही है। जो प्रभु, समाधि में बैठा हुआ है वही समाधि का अलंकार करने वाला है और वही स्वयं आभूषण भी है। आरती की ज्योति को प्रकाशित करने वाला भी प्रभु है और वह आरती गाने वाला भी प्रभु ही है। चांदी के झूले में बैठकर मज़े में झूलने वाला भी प्रभु ही है और झूला झुलाने वाला भी प्रभु ही है। जुलूस में बाजे की गड़गड़ाहट में नाचने वाला भी प्रभु है और राजोपचार सेवा में नर्तन करने वाला भी प्रभु ही है। महाद्वार में कशकोल लिए घूमने वाला फकीर भी वही है और धुनी के पास बैठा चिलम के कश भरने वाला साधु भी वही है। दक्षिणा दरबार में झोली फैलाने वाला भी प्रभु ही है और खैरात में दिल खोलकर सबकी झोली भरने वाला भी प्रभु ही है। मंदिर की चौखट पर औलाद की कामना करने वाला भी प्रभु ही है और भीड़ में अपनी माँ के बटुए से पैसे चुराने वाला बालक भी प्रभु स्वरूप ही है। भक्तजनों के चप्पलों की रक्षा करने वाला प्रभु है और चप्पलें चुराकर व्यवस्था की परीक्षा लेने वाला भी प्रभु ही है। दरबार में गाने वाला भी प्रभु ही है और वाह कहने वाला भी प्रभु ही है। पौर्णिमा की रात में हज़ारों लोगों को कड़ाके की ठंड में खुले बदन से प्रसाद परोसने वाला भी प्रभु ही है और झूठे पत्तलों में लोटने वाला भी प्रभु ही है। उत्सव के लिए कुछ रुपयों का अनुदान देकर शाही व्यवस्था की अपेक्षा करने वाला भी प्रभुस्वरूप है और चुपचाप से हुंडी में लाखों उंडेलकर चले जाने वाला भी प्रभु ही है। जयंती की राजोपचार सेवा को स्वीकार करने वाला भी प्रभु ही है और उसी पूजा के समय मंदिर के किसी गरम कोने में चादर ओढ़कर झपकियाँ मारने वाला भी प्रभु ही है। दरबार में सिंहासन पर विराजमान होकर प्रसाद देने वाला भी प्रभु ही है और कतार को तोड़कर सबको पीछे ढकेलते हुए दर्शन के लिए उतावला होनेवाला भी प्रभु ही है।

यही प्रभु का विश्वरूप है जिसके दर्शन हमें श्रीदत्त जयंती महोत्सव के समय होते हैं। यह दर्शन अद्भुत आनंद प्रदान करने वाला है। प्रभु के इस स्वरूप को देखने के लिए किसी दिव्य दृष्टि की आवश्‍यकता नहीं है। आप भी प्रभु के इस स्वरूप को देख सकते हैं परंतु नाम-रूप के भ्रम से ऊपर उठकर आपको अपनी दृष्टि को परिवर्तित करना होगा तभी यह संभव है। सर्वत्र प्रभु को देखने का अभ्यास यदि करना हो तो श्रीदत्त जयंती उत्सव से अच्छा दूसरा अवसर नहीं है। इस बार जब आप आएँ तो ध्यान रखें कि प्रभु केवल मंदिर के गर्भग्रह में ही नहीं अपितु समस्त दिशाओं में विभिन्न रूपों में आपको दर्शन दे रहा है। श्रीदत्त जयंती उत्सव में पधारिए और प्रभु के इस विश्वरूप को पहचानकर अपने हृदय में विराजित प्रभु के दर्शन कीजिए। मेंरा दावा है, कि प्रभु के इस विश्वरूप का दर्शन पाकर हमारे सद्गुरु श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के इस वचन की प्रत्यक्ष अनुभूति आप सबको अवश्‍य प्राप्त होगी।

तत्पद ईश्‍वर तूं क्रीडाया। एकचि बहुधा होसी।
आपणां विलोकुनी अति हर्षे। सर्वही आपणचि होसी।
प्रवेश करूनियां निजसत्तें। दृश्‍य जडां चेतविसी।
नामरूपाते दावुनियां। स्वस्वरूप लोपविसी॥

सकलमत शतक

सकलमत संप्रदाय के सिद्धांतो की काव्यात्मक संस्तुति

प्रथम पुष्प
(चौपाई छंद)
जय बया-मनोहर के नंदन
शतकोटि नमन शतकोटि नमन।
हे विघ्ननिवारक भवभंजन
स्वीकार करो शत शत वंदन।।१।।

वह सृष्टि सृजन का पूर्वकाल
था ब्रह्म एक केवल विशाल।
अवकाश रहित चिद्घन अखंड
था एक अकेला प्रभु प्रचंड।।२।।

संकल्प जगा प्रभु के मन में
सूने उस एकाकीपन में।
बहुविध अनेक मैं हो जाऊं
अगणित रूपों में खो जाऊं।।३।।

तब माया में खलबली मची
गुणभूतों ने मिल सृष्टि रची।
नभ अनिल अनल जल औ भूतल
नाना जीवों के देह सकल।।४।।

नर को विवेक का दान मिला
पशुओं से ऊंचा स्थान मिला।
दुर्लभ विशिष्ट सम्मान मिला
अत्युच्च श्रेष्ठ सोपान मिला।।५।।

मानव की बुद्धि निराली है
सत्‌ असत्‌ जानने वाली है।
सात्विक सुबुद्धि जो पाता है
नर नारायण बन जाता है।।६।।

लेकिन कलि का था दुष्प्रभाव
बिगड़ा मानव का निजस्वभाव।
भूला वह शास्त्रों का सुझाव
बढ़ गया धर्म मत में तनाव।।७।।

नैतिक जीवन तमग्रस्त हुआ
फिर सद्विवेक का अस्त हुआ।
आदर्श मार्ग उध्वस्त हुआ
सज्जन समाज संत्रस्त हुआ।।८।।

ईर्ष्या की विषमय ज्वाला से
विद्वेष घृणा की हाला से।
जनता के तन मन दहक उठे
बच्चे-बच्चे भी बहक उठे।।९।।

मतभेद छिड़ा मत पंथों में
विधिरीति प्रथा सिद्धांतों में।
पद्धति उपासना ग्रंथों में
धर्मांध मूढ़ दिग्भ्रांतों में।।१०।।

जो भड़का वैचारिक विवाद
सबके मन में छाया प्रमाद।
भिड़ गए लोग भी आपस में
विद्वेष बढ़ा जन मानस में।।११।।

बन उठी द्वेष की दीवारें
लेकर हाथों में तलवारें।
मत पंथ परस्पर लड़ते थे
औ’ बात-बात पर अड़ते थे।।१२।।

मत मेरा ही है सर्वश्रेष्ठ
हमसे है कोई नहीं ज्येष्ठ।।
यह समझ परस्पर भिड़ते थे
अंदर ही अंदर कुढ़ते थे।।१३।।

जी भरकर निंदा करते थे
मन अपना गंदा करते थे।
सोपान नरक के चढ़ते थे
रौरव पीड़ा में सड़ते थे।।१४।।

दुष्टों का फिर उत्पात बढ़ा
उनके सिर पर उन्माद चढा।
मानव के मन में स्वार्थ भरा
औ’ उसने दानव रूप धरा।।१५।।

विपदा में थी निज परंपरा
संताप ग्रस्त थी वसुंधरा।
चिंता में था सज्जन समाज
अब किसी तरह बच सके लाज।।१६।।

थे विषयभोग में सभी मगन
नैतिक मूल्यों का हुआ पतन।
दुष्टों के हाथों था शासन
बिक गया राज्य का सिंहासन।।१७।।

सब भूल गए थे राम भजन
करते थे तुच्छ सकाम यजन।
बस स्वार्थ देखते थे अपना
था स्वर्गप्राप्ति उनका सपना।।१८।।

वर्तन जनता के थे अशुद्ध
वैदिक परंपरा के विरुद्ध।
सारा समाज था बंटा हुआ
अध्यात्म मार्ग से हटा हुआ।।१९।।

नास्तिक मत का था यह प्रभाव
लोगों के थे बदले स्वभाव।
हरिभजन भक्ति का था अभाव
अब कौन इन्हें देता सुझाव।।२०।।

सब डूबे थे अंधियारे में
भटके भ्रम के गलियारे में।
सर्वत्र अविद्या का तम था
बस जनन मरण का ही क्रम था।।२१।।

सब विफल हो गए थे साधन
बस एक बचा था आलंबन।
श्रीप्रभु की शरण गए मुनिजन
अपनी पीड़ा का किया कथन।।२२।।

प्रभु द्रवित हुए कुछ कह न सके
भक्तों के दुख को सह न सके।
दृग मूंद लिए हो गए मौन
एकांत भंग अब करे कौन।।२३।।

थम गई काल की गति क्षणभर
निस्पन्द हुए खग पशु जलचर।
भयचकित स्तब्ध व्याकुल थे सब
था पता नहीं होगा क्या अब।।२४।।

प्रभु ने अपने लोचन खोले
स्मित हास्य वदन से वे बोले।
मैं हूँ तो तुम क्यों डरते हो?
मन को निराश क्यों करते हो।।२५।।

मेरा ले लो यह आज वचन
जिसका निश्चित होगा पालन।
होगा अधर्म का उच्चाटन
है अटल धर्म का संस्थापन।।२६।।

सुनकर प्रभु का यह आश्वासन
उल्लसित हुए सब आश्रितजन।
बज उठे वाद्य, जयघोष हुआ
सद्भक्तों को संतोष हुआ।।२७।।

सन्मार्ग विमल दिखलाने को
आंखों की धूल हटाने को।
आपस का बैर मिटाने को
सबको एकत्रित लाने को।।२८।।

जीवन का सत्य बताने को
वेदों के वचन सुनाने को।
ज्ञानामृत रस बरसाने को
अद्वैतमार्ग दिखलाने को।।२९।।

बंधन से मुक्त कराने को
फिर गीत शांति का गाने को।
उस पार हमें पहुँचाने को
गीता के पद दोहराने को।।३०।।

निद्रा से हमें जगाने को
अमृत का स्वाद चखाने को।
गा अहं ब्रह्म के गाने को
त्वं को तत्‌ से मिलवाने को।।३१।।

प्रभु सगुणरूप धरकर आए
झोली अपनी भरकर लाए।
गुरुसार्वभौम बनकर आए
भक्तों के हित चलकर आए।।३२।।

फिर निराकार साकार हुआ
माणिकप्रभु का अवतार हुआ।
इस धरती का उद्धार हुआ
श्रीगुरु का जयजयकार हुआ।।३३।।

छटनेवाला था अंधियारा
छाने वाला था उजियारा।
मार्तंड ज्ञानमय उदित हुआ
प्रभु भक्तों का मन मुदित हुआ।।३४।।

जल उठी सकलमत की मशाल
कट गया मोह का विषम जाल।
दीपित था उज्ज्वल पथ विशाल
इसपर चलने वाले निहाल।।३५।।

तत्पर अधीर थे श्रोतागण
हो योग्यमार्ग का संदर्शन।
हो गए सिद्ध प्रभु भी तत्क्षण
आरंभ हुआ फिर उद्बोधन।।३६।।

सिद्धांतसकलमत के विशेष
सारे तत्त्वों का समावेश।
ऐसा प्रभु ने संदेश दिया
अभिनव अमूल्य उपदेश दिया।।३७।।

द्वितीय पुष्प
(ताटंक छंद)
असुरों के निर्दालनहित प्रभु ने अनंत अवतार धरे
मानवता के रक्षणहित रावण जैसों के प्राण हरे।
लेकिन प्रभु ने दत्तरूप में सद्गुरु बन अवतार लिया
मनमंदिर में आत्मदीप की आभा का विस्तार किया।।३८।।

गुरुस्वरूप में प्रगटे प्रभु करने ज्ञानामृत का वितरण
अति आवश्यक था होना अद्वैत मार्ग का प्रतिपादन।
जन मानस से करने को अज्ञानतिमिर का निराकरण
श्रीप्रभु ने आरंभ किया प्रिय भक्तजनों से संभाषण।।३९।।

करुणाघन प्रभु बोले सबसे बात सुनो मेरी प्यारे
सच मानो मेरे प्रभु के प्रिय हो तुम सारे के सारे।
सब समान हैं किसी तरह का भेद नहीं उसके घर में
ना जाने तुम क्यों रखते हो भेदभाव परमेश्वर में।।४०।।

हम सबका भगवान्‌ एक है सकलजगत्‌ का वह स्वामी
वही सभी मत पंथों को प्रेरित करता अंतर्यामी।
सभी ग्रंथ सिद्धांतों का वह एकमात्र है आलंबन
इसीलिए हम सभी मतों पंथों को करते हैं वंदन।।४१।।

अरे भूलकर भी मत करना कभी दूसरों की निंदा
ना जाने कब पड़े गले में अतिघातक यम का फंदा।
शीश झुकाकर विनम्रता से सबका आदर किया करो
सबके अंदर जो-जो अच्छा हो उसको तुम लिया करो।।४२।।

मन में द्वेष अन्य पंथों का ऊपर से चल रहा भजन
ऐसों को कहते पाखंडी निश्चित उनका घोर पतन।
भजन सफल यदि करना हो तो शुद्ध रखो तुम अपना मन
कैसे उभरे प्रभु की छवि यदि दूषित हो मन का दर्पण।।४३।।

अपने बच्चों को दो संस्कृति नीति सभ्यता का शिक्षण
परंपरा का स्वाभिमान रख करो धर्म का संरक्षण।
अन्यों को ना पहुँचे पीड़ा ध्यान रहे इसका प्रतिक्षण
जनता की सेवा में अर्पित कर दो तुम अपना जीवन।।४४।।

मधुकर का लो उदाहरण देखो उसका अद्भुत लक्षण
अलग-अलग फूलों से वह करता केवल मधु संपादन।
तुम भी मधुमक्खी के इस अद्भुत सद्गुण को ग्रहण करो
दिव्य गुणों के संग्रह से आदर्श मार्ग का सृजन करो।।४५।।

सभी संप्रदायों के उत्तम तत्त्वों को संग्रहित करो
सर्वमान्य जो ज्योत सकलमत की उसको प्रज्ज्वलित करो।
देखो फिर उसके प्रकाश में क्लेष कलह सब सुलझेंगे
रीति प्रथाओं के विवाद में लोग कभी ना उलझेंगे।।४६।।

अपने लिए अन्य लोगों से रखते हो जैसी आशा
किया करो वैसा ही वर्तन बोलो सदा मधुर भाषा।
सज्जन दुर्जन आस्तिक नास्तिक किया करो सबका आदर
बसे हुए सर्वांतर्यामी प्रभु मेरे सबके अंदर।।४७।।

पूजन अर्चन आराधन की सबकी अपनी अलग प्रथा
इनको लेकर जब तुम लड़ते मुझको होती बड़ी व्यथा।
घाट भले ही अलग-अलग हों एक नदी का है पानी
पानी में भी भेद देखने की मत करना नादानी।।४८।।

अखिल जगत्‌ में सभी मतों का एक वही है निर्माता
सबके दिल की धड़कन है वह एकमेव जीवनदाता।
उपासना के मार्ग भिन्न हैं तरह-तरह के हैं साधन
लेकिन सबका लक्ष्य एक प्रभु उसका ही सबपर शासन।।४९।।

विविध धर्म के लोग भले ही विविध मार्ग अपनाते हैं
लेकिन सबके सभी अंत में एक सत्य को पाते हैं।
रीति रिवाजों की गलियों में ज्यादा भी तुम मत भटको
परम लक्ष्य को साध्य करो तुम साधन में ही मत अटको।।५०।।

नदियॉं सारी भिन्न दिशाओं में बह बहकर जाती हैं
लेकिन सभी अंत में जाकर सागर से मिल जाती हैं।
वैसे ही नाना रूपों को हम जो करते नित्य नमन
नमस्कार स्वीकार सभी के करता केवल रमा रमण।।५१।।

लोगों की बातें सुनकर तुम बहकावे में मत आना
ध्यान रहे निज मार्ग भटक कर और कहीं भी मत जाना।
राह पकड़कर एक निरंतर यदि तुम चलते जाओगे
आगे चलकर किसी एक दिन निश्चित प्रभु को पाओगे।।५२।।

भक्तों के हित प्रभु ने की संरचना अनंत पंथों की
भाषा रुचि संस्कृति अनुरूप हुई है रचना ग्रंथों की।
मार्ग एक है यही मुक्ति का योग्य नहीं ऐसा कहना
जो ऐसा कहते हैं उनकी संगत में तुम मत रहना।।५३।।

दुनियाभर के सभी संप्रदायों के साधन हैं उत्तम
सकल पंथ हैं निजशिष्यों को मुक्ति दिलाने में सक्षम।
एक स्त्रोत है हुआ जहॉं से सब मत पंथों का उद्गम
उसी स्त्रोत में मिल जाते सब, एक वही अंतिम संगम।।५४।।

अलग-अलग जन्मों में साधक विविध मार्ग अपनाता है
नाना पंथों के साधन से ज्ञान योग्यता पाता है।
लेकर अंतिम जन्म वही अद्वैत मार्ग पर आता है
महावाक्य के श्रवण-मनन से सहजमुक्त हो जाता है।।५५।।

एक अगर सबका मालिक तो लड़ते क्यों उसके बंदे
भिड़ने को तैयार सदा रहते लेकर लाठी-डंडे?
ऐसा प्रश्न किया शिष्यों ने प्रभु की वाणी को सुनकर
प्रभु बोले अब सुनो ध्यान से बोलूंगा जो है हितकर।।५६।।

अपनी-अपनी है सबकी छोटी सीमा अपनेपन की
उसके बाहर हैं जो-जो परवाह नहीं तुमको उनकी।
अपनों का ही सदा भला हो इसी सोच में तुम रहते
लेकिन अन्यों के हित थोड़ा सा भी कष्ट नहीं सहते।।५७।।

केवल अपने अपनों से तो पशु भी रखते हैं नाता
लेकिन मनुज वही सच्चा जो जग में सबको अपनाता।
बंधन तोड़ो अपनेपन की सीमा का विस्तार करो
जग सारा यह मेरा घर ऐसा कहकर व्यवहार करो।।५८।।

सब हैं अपने कौन पराया है इस छोटे से जग में
प्रेम दया करुणा का अंजन भरलो तुम अपने दृग में।
जब सब अपने ही होंगे तब कहो लड़ोगे तुम किससे
शत्रु नहीं होगा कोई तब क्या डरना इससे उससे।।५९।।

वास्तव में ईश्वर द्वारा निर्मित यह जग सुखदायक है
किंतु अविद्याग्रस्त जीव के लिए यही दुखदायक है।
नामरूप की देख विविधता जीव दिग्भ्रमित होता है
फिर बेचारा भेदजन्य दुख से जीवनभर रोता है।।६०।।

नामरूप को सत्य समझ फंस जाता जीव झमेले में
मोहित होकर खो जाता वह दृष्य जगत्‌ के मेले में।
माया के इस कुटिल खेल को तुम जब तक ना समझोगे
तब तक फिर-फिर जन्म मरण के चक्कर में ही उलझोगे।।६१।।

नामरूप में जो दिखती है वह सत्ता आत्मा की है
जीवों के अंदर की चेतनता भी जगदात्मा की है।
सकल विश्व का अधिष्ठान वह भ्रम का भी आधार वही
प्रलय मचाकर क्षणभर में रच देता फिर संसार वही।।६२।।

सतत बदलती रहने वाली नामाकृतियॉं सत्य नहीं
इनसे मिलने वाला सुख भी तुच्छ क्षणिक है नित्य नहीं।
ब्रह्म सत्य है इस जग का वह अविकारी है अव्यय है
कण-कण को जो व्याप रहा है उसका सुख ही अक्षय है।।६३।।

नामाकृतियॉं जो नश्वर हैं सत्य उन्हें तुम कहते हो
वास्तव में जो शाश्वत उसके प्रति अबोध ही रहते हो।
अंधकार में सर्प रज्जु पर जैसे भासित होता है
भ्रम के कारण आत्मा पर यह जग आभासित होता है।।६४।।

अस्तिभातिप्रिय नामरूप हैं मूल घटक इस रचना के
प्रथम तीन आत्मा के लक्षण अंतिम दो हैं माया के।
तुम क्यों होते भ्रमित देखकर नामरूप की विभिन्नता
उनके अंदर ब्रह्म छिपा है देखो उसकी अनंतता।।६५।।

भक्तों के सुखहित नाना रूपों को प्रभु करते धारण
इन रूपों में तुम करते हो भेद अविद्या के कारण।
एक सत्य ही अलग-अलग नामों से जाना जाता है
विभिन्न भाषाओं में अनेक संबोधन वह पात है।।६६।।

सकल विश्व में भरा हुआ रस व्यापक एक अकेला है
छिपकर लीला रचता छलिया मायावी अलबेला है।
घट में मिट्टी छिपी हुई ज्यों हिम में जल है छिपा हुआ
गहनों में ज्यों छिपा स्वर्ण त्यों ब्रह्म जगत्‌ में छिपा हुआ।।६७।।

दृष्य जगत्‌ के भीतर है चैतन्य भरा उसको जानों
सब रूपों के अंदर तुम बस एक उसीको पहचानो।
भेद दृष्टि के कारण ही भ्रम है पीड़ा है सब दुख है
दृष्टि बने सर्वात्मभाव की फिर देखो सुख ही सुख है।।६८।।

इसीलिए कहता हूँ निर्गुण की उपासना किया करो
आत्मरूप के अवबोधन को तुम प्रधानता दिया करो।
निर्विकल्प सर्वात्मा ही है मुख्य उपास्य सकलमत का
सकल संप्रदायों का प्रेरक चरम लक्ष्य साधन पथ का।।६९।।

गुरुगंगा विरजा तट पर गुरु सन्निधान प्रस्थापित है
पीठ यहॉं जो स्थापित उसपर चित्स्वरूप सुविराजित है।
संप्रदाय की उपासना का मुख्य केंद्र है यह आसन
है प्रतीक निर्गुण अरूप का महिमामय यह सिंहासन।।७०।।

सच्चित्सुख का सिंहासन यह जानो तुम इसकी महिमा
वह अरूप है इसीलिए है नहीं यहाँ कोई प्रतिमा।
साधकजन जब नित्य करेंगे सगुण ब्रह्म का आराधन
रिक्तासन करवाएगा उनको निर्गुण का सतत स्मरण।।७१।।

ईश्वर के नाना रूपों का तुम करना पूजन अर्चन
लेकिन सब रूपों में करना एक ब्रह्म के ही दर्शन।।
प्रेम भाव श्रद्धा से करना श्रीहरिहर का नित्य भजन
सभी रूप हैं एक उसीके बना रहे यह अनुचिंतन।।७२।।

राम कहो हनुमान कहो घनश्याम कहो या नारायण
दत्त कहो नरसिंह कहो तुम कहो रुद्र या मधुसूदन।
भेद तुम्हे जो दिखता है वह माया का है सम्मोहन
वास्तव में वह एक तत्त्व बस अलग-अलग हैं संबोधन।।७३।।

प्रभु के अंदर ही सबको, सबके अंदर प्रभु को देखो
सकल सृष्टि के कण कण में प्रभु के दर्शन करना सीखो।
मुझमें तुम में भेद नहीं है चिद्घनरूप तुम्हारा है
मिथ्या उपाधियों के कारण ही अलगाव हमारा है।।७४।।

अल्प नहीं तुम हो विराट निज क्षमता में विश्वास करो
आत्मभाव में सुस्थित रहने का तुम नित अभ्यास करो।
यही सकलमत संप्रदाय की उपासना का विधान है
आत्मा का अनुचिंतन ही इस संप्रदाय में प्रधान है।।७५।।

स्वस्वरूप का ज्ञान प्राप्त जो करते होते मुक्त वही
‘ज्ञानादेवतु कैवल्यम्‌’ शास्त्रों का भी मंतव्य यही।
निकल गए जो जन्मचक्र से लौटे फिर वे कभी नहीं
अनुभव पाकर ही समझोगे इन बातों का अर्थ सही।।७६।।

उपासना से जो साधक प्रभु को प्रसन्न कर लेते हैं
प्रभु उनको मधुमती शक्ति अपनी प्रदान कर देते हैं।
इसी शक्ति की महिमा से मधुमयीदृष्टि वे पाते हैं
सतत ब्रह्मरस के प्राशन से रसस्वरूप हो जाते हैं।।७७।।

पूर्णकृपा के अनुभव को अभिव्यक्त नहीं वह कर सकता
स्वयं ब्रह्म होकर भी ‘हूँ मैं ब्रह्म’ नहीं वह कह सकता।
लाभ-हानि निंदा-स्तुति में वह कभी न विचलित होता है
महामौन में मग्न सदा वह हंसता है ना रोता है।।७८।।

द्वेषराग से रहित स्वयं को साक्षी जिसने मान लिया
भव सागर से तर जाने का रहस्य उसने जान लिया।
दुखप्रवाह में असंग रहता नहीं कभी वह बहता है
विषय भोग लेकर भी अलिप्त कमलपत्र सा रहता है।।७९।।

मिथ्या मृगजल से कब तक तुम अपनी प्यास बुझाओगे
ज्ञानसुधा का आस्वादन लो पूर्णतृप्त हो जाओगे।
जीवभाव को त्यागो अब सर्वात्मभाव को अपनाओ
करामलकवत्‌ चित्स्वरूप को अपने ही अंदर पाओ।।८०।।

आत्मशांति के लिए लोग क्यों दूर घरों से जाते हैं
वहॉं बैठ कर फिर घर की ही यादों में खो जाते हैं।
सच्चा सिद्ध वही है जो निज स्वस्वरूप में रम जाता
विषयों के कोलाहल में भी अभंगसुख को है पाता।।८१।।

निर्जन वन में तो सबको ही शांति सहज मिल जाती है
रम्य तपोवन में क्षणभर जग की विस्मृति हो जाती है।
कर्तव्यों की भगदड़ में भी अविचल जिसकी तन्मयता
सच्चा जीवनमुक्त वही है शाश्वत उसकी चिन्मयता।।८२।।

अरे जीव तुम तो माया में आत्मा की हो परछाई
घोर अविद्या के कारण तुम भूल गए हो सच्चाई।
झूठे को सच दिखलाना ही माया की है चतुराई
सावधान रहना धोखा मत खा लेना मेरे भाई।।८३।।

भासमात्र है यह जग झूठे माया के बंधन सारे
भवनिद्रा से जागो देखो नित्यमुक्त तुम हो प्यारे।
जैसे हो वैसे ही रहना माया से तुम मत डरना
सहजमुक्त हो व्यर्थ मुक्त होने के प्रयास मत करना।।८४।।

चिदाकाश में छाया धूमिल नामरूप का ही कोहरा
उस कोहरे से ढका हुआ है सच्चित्सुख प्रभु का चेहरा।
सूरज की गरमी से जैसे क्षण में कोहरा छटता है
गुरु की पूर्णकृपा से परदा माया का भी हटता है।।८५।।

ज्ञान तुम्हे है पहले से ही विचार तुमको करना है
धो देने हैं विकार सारे अन्य नहीं कुछ बनना है।
काम हमारा मुख्य एक ही सत्प्रकाश फैलाना है
ज्ञानदृष्‍टि से तुम देखो तो यह जग एक खिलौना है।।८६।।

जीवभाव में तुम जबतक थे तबतक थी सारी पीड़ा
अहंब्रह्म कहते ही क्षण में सहज बनी जीवन क्रीड़ा।
नित्य आत्मरति में निमग्न तुम सदानंद स्वच्छंद रहो
फिरसे अब दुर्दम्य अहंता ममता का संबंध न हो।।८७।।

गुरु द्वारा संदर्शित साधन में निश्चल श्रद्धा रखना
संप्रदाय के प्रसारहित तुम चलते रहना मत थकना।
दिव्य सकलमत संप्रदाय का मार्ग सदा ज्योतिर्मय हो
जीवनयात्रा सुगम बने शुभदायक हो मंगलमय हो।।८८।।

ध्यान रखो अध्यात्म मार्ग में बात एक की ही सुनना
ज्ञानप्राप्ति के लिए कभी भी दो गुरुओं को मत चुनना।
बांटोगे  कैसे दो भागों में तुम अपनी अनन्यता
दो मार्गों पर भटकोगे तो हाथ लगेगी निष्फलता।।८९।।

सबके भीतर बसा हुआ मैं बन कर श्वासों का स्पन्दन
भाव यही कर देगा सारे मुक्‍त तुम्हारे भवबन्धन।
प्रेम भाव से जब जब तुमसे होगा मेंरा अनुचिंतन
होगा तुमको दर्शन मेंरा अपने ही अंदर तत्क्षण ।।९०।।

सुनकर प्रभु के उपदेशों को धन्य हो गए सब प्राणी
खुले सभी के ज्ञानचक्षु सुन श्रीप्रभु की अमृतवाणी।
प्रभु चरणों पर मस्तक रखकर किया सभीने अभिवादन
वचन दिया सबने प्रभु को होगा आज्ञा का प्रतिपालन।।९१।।

इन शब्दों में पूर्ण किया श्रीप्रभु ने अपना उद्बोधन
हर्षभरित दृग मूंद लिए औ’ किया मौन का आलंबन।
सगुणरूप आच्छादित कर निज चित्स्वरूप विस्तार किया
शरणागत निजभक्तजनों का श्रीप्रभु ने उद्धार किया।।९२।।

नहीं किया जा सकता शब्दों से प्रभुमहिमा का गुणगान
नेति नेति कहकर वेदों ने इसी तथ्य का दिया प्रमाण।
प्रभु की महिमा गाते गाते थक जाते सब शास्‍त्र पुराण
अप्रमेय औ’ अद्वितीय हैं प्रभु सबके जीवन औ’ प्राण।।९३।।

प्रभु ने स्थापित की समाज में शांति समन्वय समानता
आज उन्हीं के कारण दिखती है हमको यह समरसता।
प्रभु के ॠण से मुक्त कभी ना हो सकती है यह जनता
अनंत उपकारों के प्रति हम अर्पित करते कृतज्ञता।।९४।।

प्रभु की आभा से देखो सन्मार्ग मुक्‍ति का ज्योतित है
उनकी अद्भुत कार्यसिद्धि से जग यह सारा विस्मित है।
प्रभु के उपदेशों से देखो जन गण मन आकर्षित है
अपने ही भीतर उस शाश्वत सुख को पाकर हर्षित हैं।।९५।।

दिव्यपीठ अद्वैतज्ञान के प्रसारहित प्रस्थापित है
इस समाज का ज्योतिस्तंभ जाज्ज्वल्यमान यह दीपित है।
प्रखर तेज को देख दुष्टजन लज्जित खिन्न पराजित हैं
ज्ञानदीप के आश्रित जन का आत्मानंद अपरिमित है।।९६।।

भेदभाव से रहित दिव्य प्रभु का दरबार सुशोभित है
सिंहासन यह चित्सत्ता का द्योतक महिमामंडित है।
झोली सबकी भरने वाला सद्गुरु यहॉं विराजित है
यशोकीर्ति श्रीप्रभुमाणिक की दिग्दिगंत में कूजित है।।९७।।

सभी धर्म के लोगों ने श्रीप्रभु को अपना ही माना
अपने-अपने इष्ट स्वरूपों को श्रीप्रभु में ही जाना।
सभी मतों के साधक श्रीप्रभु के प्रति आदर दिखलाते
सकलमतस्थापक श्रीमाणिक इसीलिए हैं कहलाते।।९८।।

प्रभु माणिक ही गुरु नानक हैं शिवस्वरूप बसवेश्र्वर हैं
प्रभु ही हैं महबूब सुभानी मालिक हैं पैगंबर हैं।
प्रभु समर्थ श्रीरामदास हैं प्रभु कविवर ज्ञानेश्र्वर हैं
प्रभु ही सब में भरे हुए, जग प्रभुमय, प्रभु जगदीश्र्वर हैं।।९९।।

प्रभु माणिक की यशोकीर्ति से नित सुरभित भुवनत्रय हो
माणिक माणिक जपने वालों का सुख शाश्र्वत अक्षय हो।
प्रभु की अनुकंपा से पुलकित सबका जीवन प्रभुमय हो
सकलमतस्थापक सद्गुरु श्री माणिकप्रभु की जय जय हो।।१००।।

प्रभु के उपदेशों से जग यह धन्य धन्य अति धन्य हुआ
श्रीचरणों का आश्रय पा कर धन्य आज चैतन्य हुआ।
प्रभु चरणों में रखकर मस्तक नमस्कार अब करता हूँ
बार बार प्रभु पद रज कण को निजमस्तक पर धरता हूँ।।१०१।।

प्रभु के पदरज में देखो तुम है कैसी अद्भुत क्षमता
इस अयोग्य मतिमंद दास के हाथों लिखवाई कविता।
संप्रदाय के जो अभिमानी रचना उन्हें समर्पित है
मन उपवन का काव्यकुसुम यह प्रभुचरणों में अर्पित है।।१०२।।

।।जय जय हो सकलमता विजय हो।।

इस कविता को ई-बुक फॉरमेट में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक का उपयोग करें: https://manikprabhu.org/pdf-flip/sscdp.html

प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग

कल मेरे वॉट्सॅप पर किसीने एक वीडियो भेजा था। मैं वीडियो को डाउनलोड करके देखने लगा। किसी तेलुगू धारावाहिक का वह क्लिप था। उस दृष्य में ऐसा चित्रित किया गया था, कि एक पुरोहित मंत्रोच्चार करते हुए यजमान के हाथों से पूजा करवा रहे हैं। पंडितजी ने पूजा विधि का आरंभ ही ‘भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम..’ के घोष से किया। उस धारावाहिक में श्रीप्रभु की ब्रीदावली को सुनकर मुझको और वहॉं उपस्थित सभीको बड़ा आश्चर्य हुआ। हमने सोचा, कि भला इस धारावाहिक में पंडितजी ने भक्तकार्यकल्पद्रुम का घोष कैसे किया? फिल्मों में तथा धारावाहिकों में पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक विधियों के समय सामान्यरूप में जो मंत्र/श्लोक हमें सुनने को मिलते हैं उनसे हम सब परिचित हैं। परंतु इस धारावाहिक में जब हमने भक्तकार्य मंत्र सुना तो सब अचंभित रह गए। वैसे तो सारे विश्वभर में प्रभुभक्त इस महामंत्र का नित्य जप करते हैं परंतु किसी धारावाहिक में इस मंत्र को सुनना एक रोमांचक अनुभव था। मुझे लगता है कि ऐसा पहली ही बार हो रहा है और यह देखकर हम सभी प्रभुभक्तों को बड़ी प्रसन्नता हुई है।

जब पता लगाया गया कि यह कैसे हुआ तो मालूम पड़ा, कि उस धारावाहिक में पुरोहित का पात्र जिन्होंने निभाया है, वे प्रभु के ही भक्त हैं जिनका नाम है श्रीकिशन संगमेश्वर कुलकर्णी। किशन, तेलंगाणा स्थिति पटलूर ग्राम के प्रभुभक्त श्री संगमेश्वर राव कुलकर्णी के सुपुत्र हैं जिन्होंने ‘कुंकुम पूवू’ इस तेलुगु धारावाहिक में पुरोहित का पात्र निभाया है। हैदराबाद नगर में रहकर पौरोहित्य की विद्या में नैपुण्य प्राप्त करने वाले किशन को अभिनय क्षेत्र में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ और इस धारावाहिक में उन्होंने अपनी भूमिका बड़ी कुशलता से निभाई है। धारावाहिक की शूटिंग के समय निर्देशक ने उनसे कहा होगा, कि ‘पंडितजी आपको यजमान के हाथों पूजा करवानी है और कुछ मंत्र पढ़ने हैं।’ किशन ने उस दृष्य की शूटिंग में पूजा की शुरुआत ही  भक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम . . इस महामंत्र से की और प्रभु के नाम की गूंज को लाखों लोगों तक पहुँचाकर विश्वभर में फैले प्रभुभक्तों को आनंदित किया।

जब हम किसी का अच्छा काम देखते हैं तो उसका उत्साहवर्धन करने के बजाय निंदा करने लग जाते हैं। आजकल के लोगों की यह आदत बन चुकी है। उस नज़रिये से सोचने वाले इस घटना को सुनकर कहेंगे, कि ऐसा उस पंडित ने कौनसा बड़ा तीर मारा है? उससे फायदा क्या हुआ? इसमें कौनसी बड़ी बात हो गई? इस कृत्य की इतनी प्रशंसा क्यों की जा रही है?

भगवान्‌ जब समुद्र पर सेतु का निर्माण करवा रहे थे, तब वानरों की भागदौड़ को देखकर एक छोटी सी गिलहरी को भी लगा, कि मैं भी इस महत्कार्य में कुछ मदद करूं। उस गिलहरी ने छोटे-छोटे कंकर पत्थर उठाकर समुद्र में फेंके और सेतु के निर्माण में अपना योगदान दिया। वानरों द्वारा बनाए हुए प्रचंड सेतु में भले ही गिलहरी का योगदान बहुत छोटा सा था परंतु उस गिलहरी की जो भावना थी उससे प्रभावित होकर साक्षात्‌ प्रभुरामचंद्र ने उस गिलहरी को अपने हाथों में लेकर उसका कौतुक किया। आज जब-जब रामसेतु की बात चलती है, तब-तब हर बार उस गिलहरी के प्रयासों को हम याद करते हैं। कार्य की विशालता से कार्य का मूल्यांकन नहीं होता अपितु उस कार्य के पीछे जो भावना होती है उसससे कार्य की महत्ता बढ़ती है। बस मन को प्रभु से युक्त करने की ज़रूरत है फिर अपने आप हमारे हाथों से होने वाला प्रत्येक कृत्य प्रभु के महान्‌ कार्य का पूरक बनने लगता है।

पिछले अनेक वर्षों से इस संप्रदाय के निष्ठावान सद्भक्तों ने संप्रदाय के प्रसार-प्रचार के उत्तरदायित्त्व को कुशलता से निभाया है। इसीलिए आज हम देखते हैं, कि विश्वभर में प्रभु की महिमा का सुगंध सर्वत्र प्रसृत हुआ है। प्रभु के भक्त होने के नाते हम सभीका यह कर्तव्य है, कि हम अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु संप्रदाय तथा प्रभु के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के बृहत्कार्य में अपना योगदान देते रहें।

सकल मतांसी मान द्यावा।
स्वकीय संप्रदाय वाढवावा।
ज्ञानमार्गे अभ्यासावा।
शुद्ध जो।।

सद्गुरु मार्तंड माणिकप्रभु महाराज ने तो गुरुसंप्रदाय के इस श्लोक के माध्यम से प्रत्येक सांप्रदायिक प्रभुभक्त को यह आदेश दिया है कि वह अपने संप्रदाय के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रहे।

संप्रदाय के प्रसार की जब बात होती है, तब कुछ लोगों को लगता है, कि यह काम तो श्रीजी का है और वे अपनी अमोघ वाणी के माध्यम से प्रभु के दिव्य संदेश का प्रचार कर ही रहे हैं। हॉं यह बात सत्य है परंतु ऐसा कहकर सारा भार श्रीजी पर डालकर स्वयं कुछ न करना भी ठीक नहीं है। पीठ परंपरा के आचार्य होने के नाते श्रीजी का तो यह कर्तव्य है ही परंतु सांप्रदायिक अनुयायी होने के नाते संप्रदाय के प्रचार में हमारा जो योगदान होना चाहिए उसके प्रति हमें सदा सजग रहना चाहिए।

हमें लगता है, कि प्रचार-प्रसार का कार्य तो बहुत बड़ा है और यह अकेले व्यक्ति से संभव नहीं है। प्रचार-प्रसार के लिए तो बड़े-बड़े कार्यक्रमों के आयोजन करने होंगे, बड़े-बड़े बॅनर लगाने होंगे, बड़े मंडपों में लोगों की भीड़ इखट्टी करनी होगी और बहुत सारा धन खर्च करना पड़ेगा, बहुत समय देना होगा तब जाकर कहीं प्रभु का प्रचार होगा। किशन कुलकर्णी ने अपने अभिनव कृत्य से यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि मन में प्रभु के प्रति निस्सीम प्रेम और संप्रदाय का अभिमान रखकर जब कोई भक्त अपने असमर्थ हाथों से प्रभु के लिए कोई छोटा सा भी काम करता है तब प्रभु स्वयं उस कार्य को अत्यंत महान्‌ और विशाल बना देते हैं।

पटलूर के अभिमानी सद्भक्त किशन ने प्रभुनाम के प्रचार की जो अभिनव पद्धति अपनाई है वह सचमुच सराहनीय है। वैसे देखा जाए तो उस दृष्य की शूटिंग में उनसे किसी ने नहीं कहा था कि भक्तकार्य मंत्र बोलो परंतु जब भक्त का हृदय प्रभु से युक्त होता है तब उसके प्रत्येक कृत्य से प्रभु किसी न किसी रूप में जुड़ ही जाते हैं। अहंतारहित शुद्ध अंतःकरण में जब प्रभुसेवा की इच्छा जागती है तब स्वयं प्रभु इस देहरूपी रथ के सारथी बनकर हमारे हाथों से असाधारण कार्य करवाते हैं। इस विशिष्ट कृत्य से उन्होंने केवल अपने माता-पिता का ही नहीं अपितु समस्त भक्त परिवार का गौरव बढ़ाया है। आधुनिक प्रसार माध्यम से लाखों लोगों तक श्रीप्रभु की ब्रीदावली को पहुँचाकर उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण सेवा श्रीचरणों में समर्पित की है। इस प्रेरणादायी कार्य के लिए हम श्रीसंस्थान की ओर से तथा समस्त भक्त परिवार की ओर से श्री किशन कुलकर्णी का अभिनंदन करते हैं।

 

 

 

श्री हनुमंत दादा महाराज का पुण्यस्मरण

श्रीप्रभु के अग्रज श्री हनुमंत दादासाहेब महाराज की १५९वीं पुण्यतिथि के अवसर पर आज संगम में स्थित उनके समाधि मंदिर में विशेष पूजा संपन्न हई।

प्रभु चरित्र में दादासाहेब महाराज के जन्म एवं बाल्यकाल का जो वर्णन है वह अत्यंत विस्मयकारक है। बचपन में उनका जो वर्तन था उसे देखकर लोगों को उसी समय उनके असाधारण व्यक्तित्व का परिचय हो गया था। एकांतप्रिय दादा साहेब का जीवन पहले से ही वैराग्यमय रहा। जन्म से लेकर उपनयन तक वे मौन रहे इसलिए सब उन्हें गूंगा समझते थे परंतु उपनयन के समय जैसे ही उनके कानों में गायत्री मंत्र का उपदेश हुआ वे बोलने लगे। ऐसी विचित्र घटनाओं ने एवं दादा साहेब के स्वभाव ने लोगों को तो आश्चर्यचकित किया था परंतु उनके पिता अपने पुत्र के सामर्थ्य से भली-भांति परिचित थे। पहले तो लोग कहते थे, कि मनोहर नाईक का कैसा दुर्भाग्य है जो इनको ऐसा, न बोलने वाला और न हंसने वाला बच्चा जन्मा है। परंतु श्रीप्रभु के जन्म के बाद सबको यह बात समझ आ गई थी, कि यह सब प्रभु के अवतार से जुड़ी हुई पूर्वनिर्धारित योजनाओं के अनुसार हो रहा है।

बाहर से देखने वालों को मनोहर नाईक के तीन पुत्र भले ही अलग-अलग दिखते हों परंतु वास्तव में प्रभु के दोनों बंधु उन्हींके विराट अवतार के अभिन्न भाग थे। भगवान्‌ जब अवतार लेते हैं, तब अकेले नहीं आते। अपने संग सहकारियों को लेकर आते हैं और इन सहकारियों की सहायता से प्रभु अपने अवतार कार्य को पूर्ण करके निजधाम लौट जाते हैं। जैसे भगवान्‌ राम का कार्य और उनका जीवन हनुमानजी एवं लक्ष्मणजी के अवतार के बिना असंभव था, जैसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण का कार्य अर्जुन तथा बलरामजी के सहकार्य के बिना अधूरा ही होता उसी तरह श्रीप्रभु का अवतार और उनका कार्य उनके दोनों बंधुओं के सहकार्य से ही सफल हुआ। इसलिए श्रीप्रभु के अवतार को अलग से न देखते हुए हमें यह समझना होगा कि श्रीप्रभु अपने दोनों बंधुओं साथ में लेकर प्रगट हुए। इसी बात को श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज श्रीप्रभु की आरती में कहते हैं: नरहरी मोहनिशि हरी दुष्टगज हरी अनुज हो त्याचा। ज्या वर्णनी थकली शेष बृहस्पति वाचा। हनुमंत सहित गुरु त्रिगुण मूर्ति प्रगटवी। जय प्रताप श्री यश भक्तां वाढवी।। महाराजश्री कहते हैं, अपने दोनों बंधुओं समेत श्रीप्रभु का जो अवतार हुआ है वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार के समान संयुक्त अवतार है। ऐसा कहने का एक और कारण यह है, कि श्रीप्रभु ने अपनी समाधि से पहले अपने दोनों बंधुओं को निजधाम भेजा और फिर स्वयं समाधिस्त हुए। ठीक वैसे ही, जैसे कोई वाहन चालक सभी यात्रियों को गाडी में बिठाने के बाद ही खुद आखिर में गाडी पर सवार होता है।

जिन लोगों ने प्रभु चरित्र पढ़ा है, वे जानते हैं, कि श्रीप्रभु के कार्य को सफल बनाने में दादा महाराज तथा तात्या महाराज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है। सन्‌ १८४५ में श्रीप्रभु ने माणिकनगर की स्थापना की और उस समय प्रभुमहाराज ने नगर व्यवस्था तथा सभी योजनाओं को मूर्तरूप देने का कार्यभार दादा महाराज के ही कंधों पर सौंपा था। उन दिनों तात्या महाराज कल्याण के नवाब की कचहरी में कार्यरत थे इसलिए संस्थान की व्यवस्था से लेकर सभी अन्य छोटे-बड़े प्रबंध करने का उत्तरदायित्व दादा महाराज ने सम्हाला था। यद्यपि यह सारे कार्य उनके स्वभाव और रुचि से विपरीत थे तथापि उन्होंने प्रभु द्वारा उनपर सौंपा हुआ उत्तरदायित्व अत्यंत दक्षता से पूर्ण किया। माणिकनगर पधारने वाले प्रत्येक सद्भक्त की व्यवस्था यथोचितरीति से होती थी परंतु उनमें जो वृद्ध जन और छोटे बच्चे होते थे उनपर दादा महाराज का विशेष ध्यान रहता था। प्रभु के दरबार में पधारे भक्तजनों को उनके वास्तव्य के दौरान यहॉं किसी भी प्रकार की कोई असुविधा न हो इसका वे विशेष ध्यान रखते थे। प्रभु दर्शनार्थ माणिकनगर आए भक्तजनों के छोटे बच्चों को दिन में दो बार दूध मिले ऐसी व्यवस्था उन्होंने की थी और वे स्वयं बड़ी बारीकी से इस बात का ध्यान रखते थे। आज माणिकनगर में विद्यमान श्री शिवपंचायतन्‌ देवालय तथा ग्रामस्थ हनुमान मंदिर का निर्माण दादा महाराज के ही कुशल नेतृत्व में पूर्ण हुआ है। कालांतर में श्रीप्रभु के अनुज श्री नृसिंह तात्या महाराज ने श्रीसंस्थान का कार्यभार सम्हाला और दादा महाराज अपने जप-तप अनुष्ठान में अधिक समय बिताने लगे।

दादा महाराज को हठयोग विद्या में प्राविण्य प्राप्त था और वे श्रीविद्या के पहँचे हुए उपासक थे ऐसा चरित्र में पढकर हमें ज्ञात है। परंतु वास्तव में उनकी योग्यता और उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य का आकलन करने का प्रयास यदि हम करें तो उसे नादानी ही कहना होगा। दादा महाराज जैसे श्रेष्ठ योगी को श्रीप्रभु जैसे महान्‌ संत अनुज के रूप में प्राप्त थे। इससे बढिया संयोग और क्या हो सकता है? जिस समय दादा महाराज को यह संकेत मिला, कि जिस महान कार्य के लिए उनका जन्म हुआ था अब वह परिपूर्ण हो रहा है और उनके दिव्य जीवन का उद्देश्य भी पूर्ण हो चुका है, तब वे श्रीप्रभु के पास गए। कहते हैं, कि तीन दिनों तक दादा महाराज और श्रीप्रभु एकांत में रहे। अब इस बीच उनमें क्या चर्चा हुई, क्या बातचीत हुई और क्या घटित हुआ यह विषय हम जैसे कच्चे बुद्धि वाले सामान्य जीवों की समझ के बाहर का विषय है। श्रीप्रभु की अनुज्ञा से दादा महाराज ने यह निश्चित किया था, कि नियोजित तिथि को वे अपनी जीवन यात्रा को विराम देंगे। इस अनपेक्षित समाचार से माणिकनगर के वातावरण में एक गंभीरता छा गई और सबके मन दुःख से भर गए।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा के दिन दादा महाराज ने शास्त्र के आदेशानुसार अपने माता की आज्ञा लेकर श्रीप्रभु चरणों की अनुज्ञा ली और समाधि विधि को आरंभ किया। स्वयं प्रभु महाराज अपनी देखरेख में विद्वान पंडितों द्वारा धार्मिक विधि संपन्न करवा रहे थे। माणिकनगर में हज़ारों की संख्या में एकत्रित हुए स्त्री-पुरुष भारी मन से इस अलौकिक घटना के दर्शन कर रहे थे। कुछ क्षणों के लिए ही सही परंतु वहॉं उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण को महाराजश्री ने वैराग्य के रंग से सराबोर कर दिया था। इस दृष्य को देख रहे प्रत्येक व्यक्ति की आंखें आंसुओं से डबडबाई हुईं थीं परंतु चिदानंद में निमग्न दादा महाराज का चेहरा ब्रह्मतेज के लावण्य से निखर रहा था। शास्त्रानुसार दादा महाराज ने सन्यास आश्रम स्वीकार किया और महाप्रयाण के लिए आसन पर सिद्ध हुए। साधू, बैरागी और फकीरों की बड़ी भीड़ यह अनुपम दृष्य देखने के लिए माणिकनगर में उपस्थित थी। दादा महाराज ने अंतिम बार श्रीप्रभु की अनुज्ञा ली और आसन जमाकर बैठे। भजन और मृदंग के तुमुल निनाद के बीच दादा महाराज ने आंखें मूंदीं और योगमार्ग के अवलंब से ब्रह्मरंध्र का भेदन कर प्राणज्योति को प्रभुचरणों में लीन किया। प्राणोत्क्रमण के पश्चात्‌ महाराजश्री के पार्थिव देह को फूलों से सजाई हुई पालखी में रखकर भक्तजन, भजन और जयघोष के बीच संगमस्थित उनके समाधिस्थल पर पहुँचे। श्रीप्रभु के समर्थ नेतृत्व में दादा महाराज की समाधि का विधान विधिवत्‌ पूर्ण हुई और कालांतर में श्रीप्रभु ने ही समाधि स्थान पर एक सुंदर देवालय का निर्माण करवाया।

फाल्गुन शुद्ध प्रतिपदा (शनिवार १ मार्च १८६२) का दिन श्री हनुमंत दादा साहेब महाराज के पुण्यस्मरण का पर्व है। प्रतिवर्ष इस दिन, संगम में स्थित उनकी समाधि की महापूजा एवं आराधना संपन्न की जाती है। श्री दादा साहेब महाराज का जीवन एवं उनका कार्य हमें सदा श्रीप्रभु चरणों की सेवा में समर्पित रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। उस दिन भले ही महाराजश्री का देह पंचतत्त्वों में लीन हो गया हो परंतु उनकी कीर्ति सुगंध के रूप में आज भी इस नगर के वातावरण में प्रवाहित हो रही है। उस सुगंध से हमारा जीवन प्रभुमय हो ऐसी कामना करते हुए महाराजश्री की पुण्यतिथि के अवसर पर हम कृतज्ञतापूर्वक उनके चरणों में नमन अर्पित करते हैं।

श्रीमाणिक क्षेत्र दर्शन

प्रभुचरणों के दिव्य स्पर्ष से पुलकित है जो स्थान।
उस नगरी की महिमा का अब आओ सुनें बखान।।

अनुपम अद्भुत अद्वितीय है प्रभु का यह दरबार।
इसकी तुलना में फीका पड़ता सारा संसार।
श्रीसमाधि के दर्शन से मिटते सब क्लेश विकार।।
सकलमतस्थापक श्रीप्रभु की बोलो जयजयकार।।

गुरुगंगा विरजा संगम है शिष्य-गुरु का मिलाप।
इस संगम के दर्शन से ही धुल जाते सब पाप।
दंडपाणि सर्वेश्वर शिव हरते हैं भव भय ताप।
यम भी कांपे थर-थर सुनकर इनका शौर्य प्रताप।।

औदुंबर की छाया में श्रीदत्त का सन्निधान।
शब्द नहीं कर सकते इनकी महिमा का गुणगान।
कल्पवृक्ष प्रभु संप्रदाय का सुंदर सघन विशाल।
इसकी छाया में जो-जो बैठे वो हुए निहाल।।

सदा अन्नपूर्णा माता का रहता यहॉं निवास।
होती है इनके प्रसाद में अद्भुत दिव्य मिठास।
पंचमूर्ति शिव श्रीनारायण दुर्गा सूर्य गणेश।
शीघ्र तुष्ट होकर करते भक्तों पर कृपा विशेष।।

भक्तों की रक्षाहित तत्पर वीर सुभट हनुमंत।
रामनाम जपने वालों से करते प्रेम अनंत।
शरणागत की विपदाओं का क्षण में करते अंत।
इनके आश्रय में निर्भय सब साधू संत महंत।।

प्रभुनगरी का शक्तिपीठ यह अति जाज्ज्वल्य महान्‌।
आदिशक्ति मधुमती श्यामला व्यंकम्मा का स्थान।
व्यंका माता दीन जनों की एकमेव आधार।
आश्रित प्रभु भक्तों के करतीं सभी स्वप्न साकार।।

कोतवाल प्रभुनगरी के कालाग्निरुद्र हनुमान।
रिपुओं का निर्दालन करना इनका कार्य प्रधान।
अपने कंधों पर ढोते हम भक्तों का अभिमान।
रखें सुरक्षित नगरजनों की आन बान औ शान।।

मल्लारी मार्तंड हमारे मणिगिरि के सम्राट।
दुष्ट दमनहित हुए अवतरित धरकर रूप विराट।
ज्ञानखड्ग की आभा का फैला सर्वत्र प्रकाश।
येळकोट के गर्जन से गूंजे सारा आकाश।।

यही हमारी काशी मथुरा यह है गोकुल ग्राम।
यह अवंतिका यही अयोध्या यहीं हमारे राम।
सकलतीर्थ हैं बसे यहॉं, यह प्रभु का पावन धाम।
इधर उधर मत भटको भाई करो यहीं विश्राम।।

दिव्य अनोखे इस नगरी के जाग्रत देवस्थान।
नित नियमित दर्शन से होता भक्तों का कल्याण।
अलग अलग विग्रह प्रतिमाऍं नाम रूप पहचान।
छिपा हुआ सबके भीतर चैतन्य एक भगवान्‌।।

चैतन्यराज प्रभु