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प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग

प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग

पिछले अनेक वर्षों से इस संप्रदाय के निष्ठावान सद्भक्तों ने संप्रदाय के प्रसार-प्रचार के उत्तरदायित्त्व को कुशलता से निभाया है। इसीलिए आज हम देखते हैं, कि विश्वभर में प्रभु की महिमा का सुगंध सर्वत्र प्रसृत हुआ है। प्रभु के भक्त होने के नाते हम सभीका यह कर्तव्य है, कि हम अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु संप्रदाय तथा प्रभु के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के बृहत्कार्य में अपना योगदान देते रहें।

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देनेवाला प्रभु समर्थ है !

देनेवाला प्रभु समर्थ है !

उस दिन विशेषरूप से माणिकबाई का गाना सुनने हैदराबाद से आए, पायगा के नवाब भी सभा में उपस्थित थे। नवाब साहब माणिकबाई की कला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी लाखों रूपयों की मोतियों की माला को ईनाम के तौर पर एक सेवक के हाथों माणिकबाई के पास भेजा। उसी समय माणिकबाई ने गाना रोका, मंच से उतरकर श्रीजी के आसन के पास आईं और उस हार को श्रीजी के चरणों में रखते हुए नवाब साहब से बोली, “नवाब साहब मैं यहाँ महाराज की सेवा कर रही हूँ किसी का मनोरंजन नहीं और मुझे

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सारे जहां के बंदर, माणिकनगर के अंदर!

सारे जहां के बंदर, माणिकनगर के अंदर!

तभी उन में से कुछ लोगों ने यह निर्णय किया कि माणिकनगर के सभी ग्रामवासी मिलकर यदि देवालय के कार्य में पूरी लगन से जुट जाएंगे तो देवालय का निर्माणकार्य १८ अक्तूबर को होनेवाली श्रीजी की आराधना से पूर्व पूर्ण हो सकता है। केवल ८ दिन का ही समय था तथापि सभी ग्रामवासियों ने निर्णय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, देवालय का निर्माण ८ दिन में अवश्य पूर्ण करेंगे। सभी ग्रामवासियों ने श्री ज्ञानराज माणिकप्रभु महाराज को अपना निर्णय सुनाया‌ किंतु वे स्वयं कोई भी निर्णय लेने की अवस्था में नहीं थे। ‘मौनं स्वीकृति लक्षणं’ इस न्याय से माणिकनगर के पुरुषों ने, स्त्रियों ने, बालकों ने और युवकों ने १० अक्तूबर के दिन श्रमदान प्रारंभ किया। देवालय के लिए लगनेवाली संपूर्ण सामग्री का प्रबंध भी ग्रामवासियों ने ही किया। ‘कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ इस कहावत के अनुसार सारी सामग्री अपने आप जुट गई। माणिकनगर के हजारों हाथों ने दिन-रात.परिश्रम करके १७ अक्तूबर की रात समाधि सहित श्रीजी के देवालय के निर्माणकार्य को पूरा कर दिया। १८ अक्तूबर के दिन इस नवनिर्मित देवाल

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बेसन के लड्डू

बेसन के लड्डू

महाराजश्री ने आश्चर्यपूर्वक पूछा ‘‘क्यों? इस बार बेसन के लड्डू नहीं हैं क्या?’’ इस पर मामीसाहेब ने सकुचाते हुए तथा घबराते हुए उत्तर दिया ‘‘आप लड्डू तो खाते ही नहीं हैं, इसलिए मैंने सोचा, बनाकर क्या ला…

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