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श्रीप्रभु का विश्वरूप दर्शन..

श्रीप्रभु का विश्वरूप दर्शन..

जो प्रभु, समाधि में बैठा हुआ है वही समाधि का अलंकार करने वाला है और वही स्वयं आभूषण भी है। आरती की ज्योति को प्रकाशित करने वाला भी प्रभु है और वह आरती गाने वाला भी प्रभु ही है। चांदी के झूले में बैठकर मज़े में झूलने वाला भी प्रभु ही है और झूला झुलाने वाला भी प्रभु ही है। जुलूस में बाजे की गड़गड़ाहट में नाचने वाला भी प्रभु है और राजोपचार सेवा में नर्तन करने वाला भी प्रभु ही है। महाद्वार में कशकोल लिए घूमने वाला फकीर भी वही है और धुनी के पास बैठा चिलम के कश भरने वाला साधु भी वही है। दक्षिणा दरबार में झोली फैलाने वाला भी प्रभु ही है और खैरात में दिल खोलकर सबकी झोली भरने वाला भी प्रभु ही है। मंदिर की चौखट पर औलाद की कामना करने वाला भी प्रभु ही है और भीड़ में अपनी माँ के बटुए से पैसे चुराने वाला बालक भी प्रभु स्वरूप ही है। भक्तजनों के चप्पलों की रक्षा करने वाला प्रभु है और चप्पलें चुराकर व्यवस्था की परीक्षा लेने वाला भी प्रभु ही है। दरबार में गाने वाला भी प्रभु ही है और वाह कहने वाला भी प्रभु ही है। पौर्णिमा की रात में हज़ारों लोगों को कड़ाके की ठंड में खुले बदन से प्रसाद परोसने वाला

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हीरे की नथ

हीरे की नथ

मुक्ताबाई अम्मा जानती थीं, कि मंटप के सफाई की सेवा कितनी कठिन है और इसलिए उन्हें चिंता होती थी, कि उनके बाद इस सेवा में कहीं ढिलाई न आ जाए। यह सोचकर उन्होंने अपने भांजे बाबासाहेब महाराज को अपनी हीरे की नथ देकर कहा ‘इसे बेचकर कैलास मंटप में संगेमरमर का फर्श बिछवा दो।’ तदनुसार श्री बाबासाहेब महाराज मुंबई गए और वहॉं उन्होंने वह हीरे की नथ १९५० रुपयों में बेची। उस समय के १९५० रुपये का मूल्य आज लाखों रुपये होगा। उस धनराशि से श्री बाबासाहेब महाराज ने प्रभुमंदिर के कैलास मंटप में विद्यमान संगमरमर का फर्श बिछवाया। जीवन के अंतिम दिनों तक प्रभुसेवा में तल्लीन रहकर —- १९०९ को मुक्ताबाई अम्मा प्रभुस्वरूप में लीन हुईं।

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बत्तीस हत्ती

बत्तीस हत्ती

उस चिट्ठी का मुख्य वाक्य था ‘‘बत्तीस हत्ती पाठवून देणे’’ महाराजश्री की आज्ञा के अनुसार रानी जानकम्मा ने एक हाथी माणिकनगर भेजा और महाराजश्री को पत्र लिखा कि “फिलहाल केवल एक ही हाथी भेज रही हूं। हाथियों के देखरेख की पर्याप्त व्यवस्था होते ही बाकी के 31 हाथियों का प्रबंध शीघ्र ही हो जाएगा। महाराज इसे अन्यथा न समझें’’ जब महाराजश्री को पता चला कि, रानी ने हाथी भेजा है तो वे जोर से हँसे और बोले – मैं भला इस हाथी को लेकर क्या करूंगा मैंने तो कपास मांगा था और रानी ने हाथी भेज दिया। इस हाथी को वापस शरणापल्ली भेज दो।

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प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग

प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग

पिछले अनेक वर्षों से इस संप्रदाय के निष्ठावान सद्भक्तों ने संप्रदाय के प्रसार-प्रचार के उत्तरदायित्त्व को कुशलता से निभाया है। इसीलिए आज हम देखते हैं, कि विश्वभर में प्रभु की महिमा का सुगंध सर्वत्र प्रसृत हुआ है। प्रभु के भक्त होने के नाते हम सभीका यह कर्तव्य है, कि हम अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु संप्रदाय तथा प्रभु के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के बृहत्कार्य में अपना योगदान देते रहें।

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