श्रीमन्मार्तंड माणिकप्रभु महाराज की बहन सौ. मुक्ताबाई अम्मा की यह बड़ी इच्छा थी कि उन्हें पुत्र संतति की प्राप्ति हो। विवाह के बाद उन्होंने ६ पुत्रियों को जन्म दिया परंतु पुत्रहीन होने की व्यथा उन्हें सदा सताया करती थी। अम्मा ने अपने मन की पीड़ा अपने भाई मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के समक्ष रखी और ‘मेरी यह मनोकामना कब पूरी होगी?’ ऐसा सवाल महाराजश्री से पूछा। महाराजश्री बोले ‘अक्का, प्रभु का आशीर्वाद इतना सस्ता नहीं है उसे पाने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। सेवा करने की तैयारी हो तो बोलो, मैं आपको एक उपाय बताता हॅूं।’ महाराजश्री की इस बात को सुनकर अम्मा व्याकुल होकर बोलीं ‘तुम जो भी सेवा करने को कहोगे, मैं करूंगी पर मुझे बेटा चाहिए।’

प्रभुमंदिर में आज जहाँ कैलास मंटप है वहॉं पहले बांस और लकड़ियों से बना एक मंटप था। महाराजश्री ने अपनी अक्का से कहा ‘अक्का, मंदिर में घांस का जो मंटप है, आज से उसकी साफ-सफाई की जिम्मेदारी आपकी। यदि निष्ठा से आप यह सेवा करेंगी तो आपकी कामना निश्चित पूर्ण होगी।’

अगले ही दिन से मुक्ताबाई अम्मा ने मंटप के साफ-सफाई की सेवा आरंभ कर दी। मंटप में झाडू लगाना, ज़मीन को गोबर से लीपकर संम्मार्जन करना तथा रंगोली बनाने का कार्य मुक्ताबाई अम्मा बड़ी निष्ठा से नित्य करने लगीं। ठंडी हो, गर्मी हो, या बारिश उन्होंने प्रभुसेवा में कभी भी खंड पड़ने नहीं दिया। मुक्ताबाई अम्मा ने अपनी कठोर तपस्या से आखिर प्रभु को प्रसन्न कर लिया और सोमवार २८ अक्तूबर सन्‌ १८९५ को उन्होंने पुत्ररत्न को जन्म दिया। श्रीजी ने अपने इस भांजे का नाम शंकर रखा, जो आगे चलकर श्री शंकर माणिकप्रभु के रूप में प्रसिद्ध हुए।

यद्यपि मुक्ताबाई अम्मा की मनोकामना पूर्ण हो चुकी थी तथापि उन्होंने सेवा को निरंतर जारी रखा। कालांतर में उस स्थान पर सन्‌ १९०० में मार्तंड माणिकप्रभु महाराज ने भव्य सभा मंटप का निर्माण करवाया और उसे कैलास मंटप यह नाम दिया।

मुक्ताबाई अम्मा जानती थीं, कि मंटप के सफाई की सेवा कितनी कठिन है और इसलिए उन्हें चिंता होती थी, कि उनके बाद इस सेवा में कहीं ढिलाई न आ जाए। यह सोचकर उन्होंने अपने भांजे बाबासाहेब महाराज को अपनी हीरे की नथ देकर कहा ‘इसे बेचकर कैलास मंटप में संगेमरमर का फर्श बिछवा दो।’ तदनुसार श्री बाबासाहेब महाराज मुंबई गए और वहॉं उन्होंने वह हीरे की नथ १९५० रुपयों में बेची। उस समय के १९५० रुपये का मूल्य आज लाखों रुपये होगा। उस धनराशि से श्री बाबासाहेब महाराज ने प्रभुमंदिर के कैलास मंटप में विद्यमान संगमरमर का फर्श बिछवाया। जीवन के अंतिम दिनों तक प्रभुसेवा में तल्लीन रहकर —- १९०९ को मुक्ताबाई अम्मा प्रभुस्वरूप में लीन हुईं।

(श्री संस्थान के अभिलेखागार में उपलब्ध इस दस्तावेज के आधार पर यह ज्ञात होता है, कि २२ फरवरी १९०९ को श्री बाबासाहेब महाराज ने मुंबई में मुक्ताबाई अम्मा की हीरे की नथ बेची, जिससे उन्हें १९५० रुपरे प्राप्त हुए। श्री बाबासाहेब महाराज की इस मुंबई यात्रा के हिसाब का संपूर्ण विवरण इस दस्तावेज में दर्ज है।)

प्रभुमंदिर का सौंदर्य बढ़ाने वाला वह भव्य कैलास मंटप और उस मंटप का वह ऐतिहासिक संगेमरमरी फर्श आज भी हमें मुक्ताबाई अम्म की उत्कृष्ट सेवा भाव का स्मरण दिलाता है और प्रभुचरणों की सेवा के प्रति सदा तत्पर रहने को प्रेरित करता है।