तेलंगाना में निजामाबाद के निकट एक स्थान है, जिसका नाम है शरणापल्ली, जिसे सिरनापल्ली के नाम से भी जाना जाता है। शरणापल्ली संस्थान निज़ाम रियासत का एक विख्यात परगना था। शरणापल्ली घराने की प्रख्यात रानी, चिलम जानकाबाई, श्रीमन्मार्तंड माणिकप्रभु महाराज की निष्ठावान्‌ शिष्या थीं। श्रीजी के कार्यकाल में श्रीसंस्थान की जो प्रगति हुई उसमें रानी जानकाबाई का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। माणिकनगर में समय-समय पर आयोजित होने वाले छोटे-बड़े उत्सव-महोत्सवों के समय प्रभुसेवा के अवसर प्राप्त करने के लिए रानी साहिबा बड़ी तत्पर रहा करती थीं। संस्थान को जब कभी भी उनसे किसी सहायता की अपेक्षा होती, वे बड़ी उदारता से अविलंब सहकार्य करतीं।

एक बार श्रीजी ने रानी जानकम्मा को मराठी में चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी का मुख्य वाक्य था ‘‘बत्तीस हत्ती पाठवून देणे’’ महाराजश्री की आज्ञा के अनुसार रानी जानकम्मा ने एक हाथी माणिकनगर भेजा और महाराजश्री को पत्र लिखा कि “फिलहाल केवल एक ही हाथी भेज रही हूं। हाथियों के देखरेख की पर्याप्त व्यवस्था होते ही बाकी के 31 हाथियों का प्रबंध शीघ्र ही हो जाएगा। महाराज इसे अन्यथा न समझें’’ जब महाराजश्री को पता चला कि, रानी ने हाथी भेजा है तो वे जोर से हँसे और बोले – मैं भला इस हाथी को लेकर क्या करूंगा मैंने तो कपास मांगा था और रानी ने हाथी भेज दिया। इस हाथी को वापस शरणापल्ली भेज दो।

दरअसल, कन्नड भाषा में कपास को हत्ती और दिये की बाती को बत्ती कहते हैं। पत्र में महाराजश्री ने लिखा था – बत्तीस हत्ती पाठवून देणे, बत्तीस हत्ती से महाराजश्री का अभिप्राय था, कि बत्ती बनाने के लिए हत्ती की अर्थात कपास की ज़रूरत है। महारजश्री ने प्रभुमंदिर में होने वाली आरती में लगने वाली बत्ती यानी बाती के लिए हत्ती यानी कपास मंगवाया था। महाराजश्री द्वारा पत्र में लिखा हुआ वह कन्नड मिश्रित मराठी वाक्य हमारे लिए तो आज अत्यंत आमोद जनक है परंतु ज़रा सोचिए, कि ‘बत्तीस हाथी भेज दो’ यह वाक्य पढ़कर उस समय बेचारी रानी का क्या हाल हुआ होगा!