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चांदी की कटाोरी

चांदी की कटाोरी

कारण बताए जाने पर श्री शंकर माणिकप्रभु हँसे और उन्होंने अपनी पूजा सामग्री  में से चाँदी की एक बड़ी कटोरी दी और कहा ‘‘राजा, ये लो, इस कटोरी को भी कुंए में फेंक आओ!’’हाथ में चांदी की कटोरी लेकर महाराजश्री कुंए की ओर भागे और वह कटोरी भी उन्होंने कुंए में फेंक दी। पिता-पुत्र के इस विचित्र खेल पर मामीसाहेब ने जब विरोध जताया, तब श्री शंकर माणिकप्रभु महाराज ने कहा कि ‘‘सोने चाँदी जैसे बहुमूल्य वस्तुओं का मोह राजा के मन को कभी भी न छू पाए इसलिए मैंने वह कटोरी उसके हाथों से फिकवा दी। भविष्य में तुम्हारा राजा जब इस संस्था

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गुरुपौर्णिमा के अवसर पर श्रीजी का प्रवचन

गुरुपौर्णिमा के अवसर पर श्रीजी का प्रवचन

कल शुक्रवार २३ जुलाई को गुरुपौर्णिमा के अवसर नृसिंह निलय में गुरुवंदना का कार्यक्रम संपन्न हुआ। गुरुपौर्णिमा निमित्त माणिकनगर में सम्मिलित वेद पाठशाला के भूतपूर्व छात्रों द्वारा श्रीगुरु पूजन के साथ यह कार्यक्रम आरंभ हुआ। उपस्थित सद्भक्तों को संबोधित करते हुए श्रीजी...

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भक्त के सम्मान की रक्षा

भक्त के सम्मान की रक्षा

श्री शंकर माणिकप्रभु महाराज के काल में हुमनाबाद में गुंडप्पा नामक बहुत बडे व्यापारी रहते थे। गुंडप्पा श्री प्रभु संस्थान के अभिमानी सद्भक्त थे। जब भी संस्थान में कोई आर्थिक अडचन आती थी, तब महाराजश्री किसी सेवक को हुमनाबाद के बाजार में गुंडप्पा सेठ के पास भेज देते थे...

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देनेवाला प्रभु समर्थ है !

देनेवाला प्रभु समर्थ है !

उस दिन विशेषरूप से माणिकबाई का गाना सुनने हैदराबाद से आए, पायगा के नवाब भी सभा में उपस्थित थे। नवाब साहब माणिकबाई की कला से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी लाखों रूपयों की मोतियों की माला को ईनाम के तौर पर एक सेवक के हाथों माणिकबाई के पास भेजा। उसी समय माणिकबाई ने गाना रोका, मंच से उतरकर श्रीजी के आसन के पास आईं और उस हार को श्रीजी के चरणों में रखते हुए नवाब साहब से बोली, “नवाब साहब मैं यहाँ महाराज की सेवा कर रही हूँ किसी का मनोरंजन नहीं और मुझे

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सारे जहां के बंदर, माणिकनगर के अंदर!

सारे जहां के बंदर, माणिकनगर के अंदर!

तभी उन में से कुछ लोगों ने यह निर्णय किया कि माणिकनगर के सभी ग्रामवासी मिलकर यदि देवालय के कार्य में पूरी लगन से जुट जाएंगे तो देवालय का निर्माणकार्य १८ अक्तूबर को होनेवाली श्रीजी की आराधना से पूर्व पूर्ण हो सकता है। केवल ८ दिन का ही समय था तथापि सभी ग्रामवासियों ने निर्णय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, देवालय का निर्माण ८ दिन में अवश्य पूर्ण करेंगे। सभी ग्रामवासियों ने श्री ज्ञानराज माणिकप्रभु महाराज को अपना निर्णय सुनाया‌ किंतु वे स्वयं कोई भी निर्णय लेने की अवस्था में नहीं थे। ‘मौनं स्वीकृति लक्षणं’ इस न्याय से माणिकनगर के पुरुषों ने, स्त्रियों ने, बालकों ने और युवकों ने १० अक्तूबर के दिन श्रमदान प्रारंभ किया। देवालय के लिए लगनेवाली संपूर्ण सामग्री का प्रबंध भी ग्रामवासियों ने ही किया। ‘कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ इस कहावत के अनुसार सारी सामग्री अपने आप जुट गई। माणिकनगर के हजारों हाथों ने दिन-रात.परिश्रम करके १७ अक्तूबर की रात समाधि सहित श्रीजी के देवालय के निर्माणकार्य को पूरा कर दिया। १८ अक्तूबर के दिन इस नवनिर्मित देवाल

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