प्रभु प्रसादाची महिमा
माणिकनगरला श्रीजींपुढे आल्याबरोबर ‘काय झालं रे अनिल?’ म्हणून श्रीजींनी पूर्ण वृत्तांत माझ्याकडून ऐकलं. पुढचा प्रवास सुखरूप व्हावा या साठी आम्ही जेव्हां श्रीजींना पुन्हा प्रसाद विचारलं तेव्हां ते म्हणाले ‘‘दिलो कि रे प्रसाद सकाळीच. त्या प्रसादामुळेच सगळे वाचले, आणखी दुसरा प्रसाद कशाला?’’ प्रसाद होता म्हणूनच सर्वजण वाचले – श्रीजींचे हे उद्गार ऐकताच अंगावर रोमांच उभे राहिले आणि ‘योगक्षेमं वहामि अहम्’ परमेश्वराच्या या वचनाचे स्मरण झाले. आम्ही भक्त कितीही गाफिल असलो तरी अमचा तो सद्गुरु सतत आमच्या योगक्षेमाची चिंता वाहत असतो यात मुळीच शंका नही.
कालाग्निरुद्र का तेज
https://www.youtube.com/watch?v=q6r7xbRS0YM
Maniknagar – The Abode of Supreme Bliss
Yes, Shreeji breaks down complex subjects for us, but behind that is hours of patience, study and readings of scriptures, literature and books. When I attend or watch him speak, I think of a bee that collects nectar from right flowers and deposits it into a honeycomb. Remember, despite the tireless and selfless efforts, a bee never tastes honey, whereas it is the people [devotees and seekers] that do.
शंकराप्पा पर प्रभुकृपा
https://www.youtube.com/watch?v=DDk0sCn5mpI
चांदी की कटाोरी
कारण बताए जाने पर श्री शंकर माणिकप्रभु हँसे और उन्होंने अपनी पूजा सामग्री में से चाँदी की एक बड़ी कटोरी दी और कहा ‘‘राजा, ये लो, इस कटोरी को भी कुंए में फेंक आओ!’’हाथ में चांदी की कटोरी लेकर महाराजश्री कुंए की ओर भागे और वह कटोरी भी उन्होंने कुंए में फेंक दी। पिता-पुत्र के इस विचित्र खेल पर मामीसाहेब ने जब विरोध जताया, तब श्री शंकर माणिकप्रभु महाराज ने कहा कि ‘‘सोने चाँदी जैसे बहुमूल्य वस्तुओं का मोह राजा के मन को कभी भी न छू पाए इसलिए मैंने वह कटोरी उसके हाथों से फिकवा दी। भविष्य में तुम्हारा राजा जब इस संस्था
गुरुपौर्णिमा के अवसर पर श्रीजी का प्रवचन
कल शुक्रवार २३ जुलाई को गुरुपौर्णिमा के अवसर नृसिंह निलय में गुरुवंदना का कार्यक्रम संपन्न हुआ। गुरुपौर्णिमा निमित्त माणिकनगर में सम्मिलित वेद पाठशाला के भूतपूर्व छात्रों द्वारा श्रीगुरु पूजन के साथ यह कार्यक्रम आरंभ हुआ। उपस्थित सद्भक्तों को संबोधित करते हुए श्रीजी...






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