कोमल कोमल पग से प्रभु आँगन में खेल रचाते थे,
देखने प्रभु का बाल रूप भगवान भी छुपकर आते थे।

वृंदावन का कृष्ण भयो है, हर नर-नारी कहते थे,
बाल प्रभु को गोद में लेकर उसकी बलैया लेते थे।

कहता कोई राम रूप है, दस्तगीर कोई कहता है,
जैसा भाव प्रकट होता, प्रभु उसी रूप में होते हैं।

छवि देखकर प्रभु की सारे , कष्ट दूर हो जाते हैं,
खेल-खेल में कई दिनों तक प्रभु गुप्त ही रहते हैं।

मन्नत सबकी पूरी होती, खाली ना कोई जाता है,
हर मर्ज की दवा प्रभु है, उसका माणिक नाम है।

धन्य हुआ कल्याण ग्राम और पावन हो गई भूमि है,
धन्य हुई ये मिट्टी, जिसमें प्रभु नाम की खुशबू है।

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