ज्ञान प्रबोध
परम पूज्य श्रीजी, अधिक मास के निमित्त गत तीस दिनों से हम सभी को आपके कारण, गीता ज्ञानयज्ञ का लाभ लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हम प्रभुभक्तों
श्रीमधुमती पंचरात्रोत्सव
योगिनी व्यंकम्मा ने आजीवन श्रीप्रभुचरणों की सेवा की तथा प्रभुमहाराज के प्रति असीम श्रद्धा-भक्ति के फलस्वरूप परमपद को प्राप्त हुईं।
गुरुमंत्र
एक राजा था। उसके राज्य में एक साधु रहा करता था। राज्य के अनेक लोग उस साधु के शिष्य बन गए थे। साधु की कीर्ति राजा तक पहुँची। राजा के मन में उस साधु से मिलने की इच्छा जागृत हुई और एक दिन राजा उस साधु के आश्रम में जा पहुँचा। राजा ने साधु को नमस्कार किया और कहा –...
कां रे मना अल्लड धावसि तू
कां रे मना अल्लड धावसि तू टाळुनि गुरुच्या मार्गाला विसरुनि श्रीगुरु भजनाला वृथा रमसि भव नादी रे॥१ ॥ विषयांच्या नादात अडकुनी व्यर्थ दवडिसी जीवन हे गुरुचरणी तू लाग त्वरेंने जाय समुळ भवव्याधी रे॥२॥ मूढ मना किति सांगू आता धरि तू श्रीगुरु चरणा रे सिद्धज्ञान...
मी मिथ्या जन बोली
श्री सद्गुरु सिद्धराज माणिकप्रभु महाराजांना ज्यांनी जवळून पाहिले आहे त्यांना माहित आहे कि महाराज बहुधा उघडपणे काही न बोलता संकेतानी आपला संदेश भक्तांना कळवायचे. सद्गुरूंनी उद्गारलेला प्रत्येक शब्द तर मोलाचा असतोच पण कधी-कधी न बोलता ते जे सांगतात त्यांनी आपला उद्धार...
गुरुवाणी
एक बार नारदजी की हनुमानजी से भेंट हुई। दोनों परम भक्त, दोनों ज्ञानी और दोनों अतीव बुद्धिमान्। कुशल-क्षेम के पश्चात् नारदजी ने अपने स्वभाव के अनुसार हनुमानजी को छेड़ना प्रारंभ कर दिया। नारदजी ने कहा - "हनुमान्! तुम निस्संदेह सर्वश्रेष्ठ भक्त हो, तुम्हारी भक्ति अनुपम...





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