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ताज पे साज

ताज पे साज

पान no. 11 वर महाराजश्री शिव शंकरालाच मन नियंत्रित करण्यास बोलावतात कारण  मन हे नियंत्रणासाठी अतिशय दुष्कर आहे असे लिहिले आहे. श्री ज्ञानराज महाराजांच्याही एका पदात प्रभू तुम्हारे पद कमल पर मन सदा एकाग्र हो मध्ये ते माणिक प्रभूंना प्रार्थना करतात की माझे मन एकाग्र होऊ दे. माणिकप्रभु उत्तरादाखल अप्रतिम मौक्तिक देतात. म्हणतात, मन स्थिर झाले तर ते मन कुठले? ते तर आत्मरुप झाले.

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प्रसाद

प्रसाद

५०० कि.मी. हुन अधिक अंतर गाडी चालली होती. प्राथमिक अंदाजानुसार बॅटरी व सेल्फ सुरूवात होत नसल्याचे कारण पहायचे होते. मी गाडीतून खाली उतरलो. मागे खोळंबलेल्या गाड्यांना बाजूने जाण्यास खुणेनेच सांगितले. तेवढ्यात एक दुचाकी समोर येऊन थांबली. त्यावर दोन गृहस्थ होते. त्यांनी विचारपूस केली, व त्यांच्यापैकी एक गाडी मागे गेला. मागे खोळंबलेल्या गाड्यांना बाजूने जाण्यास सांगू लागला. तर दुस-या व्यक्तीने मला गाडीचे बॉनेट उघडण्यास सांगितले व गाडी तपासली. बॅटरी कनेक्टर सैल झाले होते ते तात्पुरते ठीक करून दिले. व आम्हाला सांगितले की तात्पुरते काम केले आहे,

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पूर्ण गुरुकृपा फल हे…

पूर्ण गुरुकृपा फल हे…

आकाश में पूर्व क्षितिज पर सूर्योदय का संकेत देने वाली लाली छायी हुई थी। वह दिव्य स्वप्न तो समाप्त हो चुका था परंतु श्रीजी अभी भी उसी सुखद अनुभूति में डूबे हुए थे। मंत्र के शब्द श्रीजी के कानों में सतत गूँज रहे थे। फिर श्रीजी ने शीघ्रता से स्नान संध्यादि नित्यक्रम संपन्न किए और प्रभु के तत्कालीन मुख्य अर्चक स्व. श्री पुरुषोत्तम शास्त्री को बुलवाकर स्वप्न की घटना का उल्लेख किया। श्री पुरुषोत्तम शास्त्री ने श्री भीमभट, श्री दत्त दीक्षित, श्री गोविंद दीक्षित आदि पंडितों से चर्चा कर श्रीजी को स्वप्न में प्राप्त मंत्र को श्री शंकर माणिकप्रभु महाराज की समाधि के समक्ष शास्त्रोक्त विधान से ग्रहण करने का प्र

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गादी अष्टमी के अवसर पर महापूजा

गादी अष्टमी के अवसर पर महापूजा

आज गादी अष्टमी के अवसर पर श्रीजी ने श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के समाधि मंदिर में महापूजा संपन्न की। सन्‌ १९१६ में इसी दिन श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज को जिस स्थान पर श्रीप्रभु के दर्शन हुए थे वहॉं उन्होंने गादी की स्थापना की थी। १९१६ के उस पवित्रतम प्रसंग के स्मरण में प्रतिवर्ष माणिकनगर में गादी अष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। आज गादी अष्टमी और श्रावण सोमवार का विशेष संयोग होने से कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भक्तजनों की उपस्थिति रही। पूजन, भजन और आरती के उपरांत भक्तजनों ने श्रीदर्शन एवं महाप्रसाद ग्रहण किया।

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हीरे की नथ

हीरे की नथ

मुक्ताबाई अम्मा जानती थीं, कि मंटप के सफाई की सेवा कितनी कठिन है और इसलिए उन्हें चिंता होती थी, कि उनके बाद इस सेवा में कहीं ढिलाई न आ जाए। यह सोचकर उन्होंने अपने भांजे बाबासाहेब महाराज को अपनी हीरे की नथ देकर कहा ‘इसे बेचकर कैलास मंटप में संगेमरमर का फर्श बिछवा दो।’ तदनुसार श्री बाबासाहेब महाराज मुंबई गए और वहॉं उन्होंने वह हीरे की नथ १९५० रुपयों में बेची। उस समय के १९५० रुपये का मूल्य आज लाखों रुपये होगा। उस धनराशि से श्री बाबासाहेब महाराज ने प्रभुमंदिर के कैलास मंटप में विद्यमान संगमरमर का फर्श बिछवाया। जीवन के अंतिम दिनों तक प्रभुसेवा में तल्लीन रहकर —- १९०९ को मुक्ताबाई अम्मा प्रभुस्वरूप में लीन हुईं।

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