गादी अष्टमी के अवसर पर महापूजा
आज गादी अष्टमी के अवसर पर श्रीजी ने श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज के समाधि मंदिर में महापूजा संपन्न की। सन् १९१६ में इसी दिन श्री मार्तंड माणिकप्रभु महाराज को जिस स्थान पर श्रीप्रभु के दर्शन हुए थे वहॉं उन्होंने गादी की स्थापना की थी। १९१६ के उस पवित्रतम प्रसंग के स्मरण में प्रतिवर्ष माणिकनगर में गादी अष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। आज गादी अष्टमी और श्रावण सोमवार का विशेष संयोग होने से कार्यक्रम में बड़ी संख्या में भक्तजनों की उपस्थिति रही। पूजन, भजन और आरती के उपरांत भक्तजनों ने श्रीदर्शन एवं महाप्रसाद ग्रहण किया।
हीरे की नथ
मुक्ताबाई अम्मा जानती थीं, कि मंटप के सफाई की सेवा कितनी कठिन है और इसलिए उन्हें चिंता होती थी, कि उनके बाद इस सेवा में कहीं ढिलाई न आ जाए। यह सोचकर उन्होंने अपने भांजे बाबासाहेब महाराज को अपनी हीरे की नथ देकर कहा ‘इसे बेचकर कैलास मंटप में संगेमरमर का फर्श बिछवा दो।’ तदनुसार श्री बाबासाहेब महाराज मुंबई गए और वहॉं उन्होंने वह हीरे की नथ १९५० रुपयों में बेची। उस समय के १९५० रुपये का मूल्य आज लाखों रुपये होगा। उस धनराशि से श्री बाबासाहेब महाराज ने प्रभुमंदिर के कैलास मंटप में विद्यमान संगमरमर का फर्श बिछवाया। जीवन के अंतिम दिनों तक प्रभुसेवा में तल्लीन रहकर —- १९०९ को मुक्ताबाई अम्मा प्रभुस्वरूप में लीन हुईं।
बत्तीस हत्ती
उस चिट्ठी का मुख्य वाक्य था ‘‘बत्तीस हत्ती पाठवून देणे’’ महाराजश्री की आज्ञा के अनुसार रानी जानकम्मा ने एक हाथी माणिकनगर भेजा और महाराजश्री को पत्र लिखा कि “फिलहाल केवल एक ही हाथी भेज रही हूं। हाथियों के देखरेख की पर्याप्त व्यवस्था होते ही बाकी के 31 हाथियों का प्रबंध शीघ्र ही हो जाएगा। महाराज इसे अन्यथा न समझें’’ जब महाराजश्री को पता चला कि, रानी ने हाथी भेजा है तो वे जोर से हँसे और बोले – मैं भला इस हाथी को लेकर क्या करूंगा मैंने तो कपास मांगा था और रानी ने हाथी भेज दिया। इस हाथी को वापस शरणापल्ली भेज दो।
तू चुकु नको आत्मा रामा
नौबतखान्यात मध्यरात्रीची नौबत व शहनाई वाजत होती. श्री मार्तंड प्रभूंनी शहनाई वाजविणान्यास बोलावून घेतले व विचारले ‘‘तू कुठलं गाणं वाजवीत होतास ?’’ शहनाईवाला घाबरून गेला व म्हणाला – ‘‘महाराज, कालच तुळजापूरचे काही गोंधळी आले होते, त्यांच्या तोंडून मी ही धून ऐकली, मला आवडली, म्हणून मी वाजवली.’’ महाराज म्हणाले – ‘‘असतील तेथून त्या गोंधळ्यांस बोलावून घेऊन ये.’’
आमचा राजा
हे शब्द ऐकताच व्यंकटराव ओशाळला. काय उत्तर द्यावे हेच त्याला समजेना. ‘‘महाराज, मुले लहान आहेत…’’ वगैरे सबबी तो सांगू लागला. त्याचे उत्तर ऐकून महाराजांना हसू आवरेना. ते पाहून हणमंतराव म्हणाला ‘‘महाराज, मी आपल्या बरोबर येण्यास तयार आहे. आपण मला घेऊन चला.’’ महाराजांची चर्या गंभीर झाली. काही तरी विचार करून ते म्हणाले, ‘‘तुला मी घेऊन गेलो असतो रे हणमंत, पण मुद्दाम येथे ठेवून जात आहे. माझ्या मनात बरीच कार्य करावयाची होती. ती पुरी झाली नाहीत.
प्रभुनाम प्रचार का अभिनव प्रयोग
पिछले अनेक वर्षों से इस संप्रदाय के निष्ठावान सद्भक्तों ने संप्रदाय के प्रसार-प्रचार के उत्तरदायित्त्व को कुशलता से निभाया है। इसीलिए आज हम देखते हैं, कि विश्वभर में प्रभु की महिमा का सुगंध सर्वत्र प्रसृत हुआ है। प्रभु के भक्त होने के नाते हम सभीका यह कर्तव्य है, कि हम अपनी क्षमता के अनुसार प्रभु संप्रदाय तथा प्रभु के उपदेशों के प्रचार-प्रसार के बृहत्कार्य में अपना योगदान देते रहें।






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