वेदांत सप्ताह महोत्सव

जैसे की आप सभी को अवगत है की हम सभी का प्रिय वेदांत सप्ताह महोत्सव आने वाला है। वेदांत सप्ताह का वर्णन यदि मैं शब्दों में कर सकती हूं, ऐसा कहना मेरी मूर्खता होगी। बस मैं एक प्रयास करूंगी कि आपकी ओर मेरी भावनाएं संक्षिप्त शब्दों में साझा कर सकूं।
यदि आप सभी को अवगत है कि वृंदावन पर बहुत ही सुंदर रचना है कि— “मेरो मन वृंदावन में अटको, मेरो मन हरि चरणन में अटको।” वैसे ही हम सभी प्रभु भक्तों के लिये यह रचना सुनते ही प्रभु के स्थान यानी माणिकनगर की याद आती है। उसी पावन क्षेत्र में होने वाला वेदांत सप्ताह यानी मार्तंड प्रभु ने बताए हुए सप्ताह के अत्यंत सरल क्रम, जो हमें सच में प्रभु तक ले जाने में मदद करते हैं।

उन सात दिनों में प्रभु चरित्र, गुरु चरित्र का पारायण, श्रीजी की अमृत वाणी से भगवद्गीता का अध्ययन, बाल गोपाल क्रीड़ा, साप्ताहिक भजन, और अंत में अत्यंत भव्य दिव्य दिंडी से इस कार्यक्रम का समारोप होता है।

प्रभु चरित्र पारायण— प्रभु की कृपा से मुझे एक बार अवसर प्राप्त हुआ कि मैं उनका ही चरित्र उनके ही क्षेत्र में बैठकर पढ़ और समझ सकूं। वो औदुंबर की शीतल छाया, पास में ही हमारे प्रभु की समाधि यानी स्वयं प्रभु महाराज, ब्राह्मणों के द्वारा विस्तृत मंत्र-पाठ करते हुए हमारे प्रभु की नित्य पूजा, और शांति से हमारा पढ़ना। क्या यह अनुभव आपको साधारण लगता है? यदि आपका जवाब हां है तो क्षमा चाहती हूं, पर आपने सच में पारायण तो किया ही नहीं है। अरे, कितना सामर्थ्य उस जगह में! जब पारायण करने की इच्छा घर में होती है तो कलश आदि सभी चीज़ों का प्रबंध करना पड़ता है। पर यहां तो स्वयं हमारे श्री प्रभु ही विराजमान हैं, तो उस कलश की आवश्यकता ही नहीं है। बस वहां एक ही अनुभव होता है। प्रभु महाराज स्वयं हमारे समक्ष हैं, उनका चरित्र हाथ में है, आंखें पढ़ने का काम कर रही हैं, दिमाग समझकर मन को जागृत कर उस प्रभु की लीलाओं का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा है, और आंखें नम हो रही हैं उस प्रभु की महिमा से। यह अनुभव थोड़ा बहुत घर में होता है, पर कहते हैं ना— “क्षेत्राची महिमाच वेगळी असते।” तो बस यही बात है। मैं तो हर जन्म-जन्म तक यहां पारायण करने का सुख प्राप्त करना चाहूंगी और मेरे प्रभु की लीलाओं का स्मरण कर उन्हें और भी जानना चाहूंगी।

फिर बारी आती है श्रीजी से कुछ ज्ञान प्राप्त करने की, यानी वेदांत शिक्षा शिबिर की। सप्ताह का नाम भी वेदांत है तो वेदांत शास्त्र का थोड़ा-बहुत ज्ञान हम श्रीजी से प्राप्त करते हैं। थोड़ा-बहुत इसलिए कह रही हूं कि वो ज्ञानस्वरूप श्रीजी तो ज्ञान का सागर हैं ही, पर हम भी तो मूढ़-मति का सागर ही हैं, जो थोड़ा-बहुत ही समझ पाते हैं। मुझे तो उन श्रीजी की दयालुता पर भी दया आती है कि उन्हें भी यह ज्ञात है कि हमें कुछ समझ आता नहीं है, फिर भी इतनी आसान भाषा में समझाते हैं। उनकी यही दया हमें और मन लगाकर सुनने-समझने का सामर्थ्य देती है। सच में धन्य हैं हमारे श्रीजी, जो इतने मूढ़ शिष्यों का उद्धार करने हेतु उस सिंहासन पर हाथों में भगवद्गीता, अधरों पर प्यारा-सा स्मितहास्य लेकर विराजमान हुए हैं। उस समय हमें सच में गुरुकुल में होने का अनुभव होता है। 2 घंटे बिना रुके हमें समझाना, और यदि अध्याय 7 दिनों में समाप्त नहीं हो पा रहा तो extra class है, सभी को आना है— ऐसा संदेश सुबह की क्लास में ही देना। “हो म्हणा, मी म्हणून सांगतो, ते ही फुकट सांगतो।” ऐसे विविध बातों से हंसाते-हंसाते ज्ञान प्राप्त करवाने की कला सिर्फ हमारे श्रीजी में ही है। सप्ताह के आखिरी दिन सभी लोग श्रीजी को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, श्रीजी के प्रति उनका प्रेम प्रकट करते हैं। किंतु आखिरी के दिन मेरा मन तो सिर्फ श्रीजी से क्षमा मांगने का करता है कि इतना सब कुछ ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मैं उसे आत्मसात नहीं कर पाई। इसका अर्थ यह भी नहीं कि एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर, पर बहुत थोड़ा कर पाई— इसी का दुख रहता है। यह अनुभव बहुत ही अविस्मरणीय और अतुलनीय है। पर श्रीजी के चरणों में अंत में यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा हम पर सदा बनी रहे और वो जो कुछ हमें बता रहे हैं उसे हम समझ सकें, और सिर्फ समझें नहीं तो उसे आत्मसात भी कर सकें।

अब वह घटिका का समय है जहां हम माणिकनगर में श्री कृष्ण के गोकुल का भी दर्शन कर सकते हैं। अरे हां, गोकुल— सत्य सुना है। कैसे, वो बताती हूं। जैसे गोकुल में कान्हा बाल गोपाल क्रीड़ा करते हैं, ठीक वैसे ही हमारे माणिकनगर में भी बाल गोपाल क्रीड़ा यानी कोल का भी आयोजन होता है। सप्ताह के हर दिन के हिसाब से सब लोग एक ही रंग के कपड़े पहनकर उस दत्तलोक में क्रीड़ा करते हैं तो वह दृश्य अत्यंत रमणीय होता है। बस देखते ही रहो— ऐसा ही लगता है। उस प्रभु समाधि के समक्ष विविध पीठाधीशों के द्वारा रचे गए भजनों का गायन करते हुए इतनी गर्मी में नाचना कोई आम इंसान का काम नहीं है; उसके लिए सच में प्रभु से प्रेम होने की आवश्यकता है। उन सभी कोल खेलने वाली स्त्रियों में कृष्ण-प्रेम में नाचने वाली मीरा बाई दिखती हैं, तो पुरुषों में सभी संतों का अनुभव होता है। कई लोगों को लगता होगा कि मैं ये क्या कह रही हूं। वो खेलने वाले लोगों में से बहुत से लोग तो कितने दुर्गुणी होते हैं। उनको मीरा बाई और संतों की उपमा देना सही नहीं है। अरे, पर हमारा उद्देश्य तो उन सब में प्रभु को ही देखना है। वो सब हमारे प्रभु के शिष्य हैं। जैसे नाना नाच्या के दुर्गुणों को सद्गुणों में बदलने का सामर्थ्य हमारे प्रभु में है, तो वो सभी भी हमारे प्रभु के ही आश्रित हैं। तो मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। यह क्रीड़ा सात दिन तक चलती है, और आठवें यानी दिंडी के दिन इतनी मध्य-रात्रि तक खड़े रहकर, दिंडी में सहभागी होकर भी, उतने ही उल्लास से बिना थके वह दिंडी में भी रात्री में कोल खेलते हैं। तो सच में इन सभी के रूपों में सभी संत, महात्मा, देवी-देवता आदि सभी आकर हमारे दिंडी के कार्यक्रम का आनंद लेते हुए, हमारे प्रभु महाराज का भक्त परिवार का वैभव देखकर, हमारे प्रभु की स्तुति करते हुए वही दांडिया लेकर नाचते हैं— यही मेरा विश्वास है। इन सभी भक्त-जनों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम, जो इतने उल्लास से भक्ति कर रहे हैं।

अब रात्री में फिर से श्रीजी की अमृत वाणी सुनने के पश्चात अब बारी आती है हम सभी के प्रिय क्षण की, यानी साप्ताहिक भजन की। हमारे संप्रदाय में जब भी पारायण किया जाता है तो रात्री में सातवारिक भजन होना भी जरूरी माना गया है। माणिकनगर में प्रभु के समक्ष पारायण करने के पश्चात रात्री में प्रभु एवं प्रभु के ज्ञानस्वरूप के साथ भजन करने का आनंद अकेले घर में पारायण और भजन करने से कई गुणा अधिक है। आधे घंटे तो सिर्फ “गणराज पायी” यही पद चलता है। वैसे हमें न कोई राग आता है, न ही हमें उनके साथ भजन गाना आता है। पर बस आनंदराज महाराज की मधुर आवाज सुनने से ही हमें भी हम ही गा रहे हैं— ऐसी अनुभूति ही हमारे लिये पर्याप्त है। भजन ताल में गाना नहीं आता, फिर भी जो हर एक व्यक्ति के भीतर भजन को गाने की इच्छा होती है, वो मुझे इस पंक्ति की याद दिलाती है कि— “वेडे वाकडे गाईन, परी तुझा दास होईन।” बेचारे प्रभु कितने दिनों से इस बेसुरी आवाज को झेल रहे हैं, वो केवल उस भक्त के प्रेम हेतु। रात्री में भजन, आरती, उपदेश रत्नमाला का श्रीजी के साथ पठण, प्रसाद— यह सारी चीज़ें अत्यंत ही भक्तीमय अनुभव कराने वाली हैं। श्रीजी जब घर वापस लौटते हैं तो “कमल वदनी हे” इस पद का गायन होता है। तो दिल भर आता है कि गया आज का भी दिन गया। पर इस बावले मन को— अरे शांत हो जा, अभी तो रात भर की दिंडी भी बाकी है— ऐसा खिलौना देकर शांत करते हैं।

आखिरकार सात दिन बितने के बाद आठवें दिन की दिंडी का दिन भी आ ही जाता है। उससे भी पहले माणिक क्विज़ का आयोजन होता है। ‘खेल-खेल में जानो प्रभु को’ यह उद्देश्य सच में संप्रदाय और प्रभु के बारे में हर साल कुछ नया बता कर ही जाता है।
हमारे मन में तो ऐसे भी भ्रम हैं कि यदि किसी को सारी रचनाएं कंठस्थ हैं तो उसे सब कुछ अवगत है। पर ऐसा नहीं है। क्या मात्र रचनाएं कंठस्थ होने से हम सच में प्रभु के बारे में जान पाएंगे? यह तो वही बात हुई जैसे श्रीजी ने उनके प्रवचन में कथा बताई थी। जब एक साधु कुछ पक्षियों को सिखाने का प्रयास करता है कि शिकारी आएगा, दाना डालेगा, पर तुम्हें जाल में नहीं फंसना है। यह कंठस्थ करा लेता है और वे पक्षी भी जड़-बुद्धि यह बोलते-बोलते उस जाल में फंस जाते हैं। तो हमने भी क्या अलग किया है? हमने भी हमारे गुरु के द्वारा की गई रचना का सार समझकर— माया के जाल में मत फंसो, प्रभु को प्राप्त करो— यह उपदेश कंठस्थ कर, हमने भी जाल में छलांग तो लगाई ही है। और फिर हमें सारी रचनाएं कंठस्थ हैं— इसका अहंकार तो अलग ही है। एवं हमारे मार्तंड प्रभु भी तो कहते है कि— “मी मोठा दंभ हा हटवा। हे वय जाते अहा हा हा॥” इसका अर्थ यह नहीं कि रचनाएं कंठस्थ करना गलत है। वो तो बहुत ही अच्छी बात है कि आपको आधुनिक गानों से ज़्यादा प्रभु की रचनाएं कंठस्थ करना पसंद है, एवं मैं भी उन्हीं में से एक हूं। किंतु मैं बस यही कहना चाहती हूं कि सिर्फ रचनाएं ज्ञात हैं— इस आधार पर हम प्रभु और संप्रदाय के बारे में सब जानते हैं, इस झूठे ताज का दिखावा करने की बजाय, चलो सच में उस प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानने की कोशिश करते हैं और इस सप्ताह में सहभागी होते हैं। शरनांगत होकर, इस सकलमत के मेले में कभी आइये‌ तो सही, यहा सारे विकार नष्ट करणे वाली दुकाने प्रभु ने लगाई रखी है | बस उस दुकानदार प्रभु से सही चीज मांग लेना | वो सदैव उत्कृष्ट ही देते है | यदि हम प्रभु को जान गए तो और कुछ जानना बाकी ही नहीं रहेगा। मैं तो स्वयं से यह बात स्वीकार करना चाहूंगी कि थोड़ी-बहुत रचनाएं मुझे भी कंठस्थ हैं, पर मैं संप्रदाय और प्रभु के बारे में बहुत कम जानती हूं। जीवन में पढ़ाई समाप्त होने के बाद मेरा पहला लक्ष्य प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानना यही होगा। माणिक क्विझ एक ऐसा आयोजन है जो हमें संप्रदाय के बारे मे बहुत जाणकारी देता है | स्क्रीन पर चैतन्यराज महाराज की मधुर ओर भावविभोर आवाज मे संप्रदाय की सारी जानकारी ग्रहण करने में बहुत ही आसानी होती है | वो हर बार कइ ऐसी बाते बताते है जो सिर्फ उस दीन ही हमने सुनी होती है | इसका सारा श्रेय चैतन्यराज महाराज को ही जाता है, जो हमें संप्रदाय के प्रति इतना आकर्षित कर रहे है |

फिर 11 बजे मार्तंड प्रभु की समाधि के समक्ष से दिंडी का आरंभ होता है, तो 12 घंटे चलने वाली दिंडी रुकती ही नहीं है। श्रीजी के करकमलों से अबीर का आनंद लेते हुए निश्चित स्थान पर निश्चित पद गाया जाता है। वो गाते-गाते कब एकदम काली रात सुबह की न सहने वाली धूप में बदल जाती है— उसका पता मुझे आज तक नहीं चला। ज़रा सोचकर देखिए— जिन पदों का अर्थ भी हमें समझ नहीं आता, फिर भी हम इतने झूम उठते हैं; तो उन्हीं पदों का श्रीजी को अर्थ समझ आता है तो वो तो कितने आनंदित होते होंगे ना! हमारे मार्तंड प्रभु कहते हैं, वो एकदम सच है— “नाही स्वर्गी, वैकुंठी हे सुख।” यह सुख केवल और केवल माणिकनगर में ही है। श्रीजी के दर्शन पाकर उनके हाथों से अबीर डलवा लेना यानी जीवन भर की चिंताओं से मुक्त होना ही है। वही अबीर थोड़ा-सा प्रसाद-रूपी घर लेकर आना और यदि कोई घर में बीमार हो तो उसे श्रद्धापूर्वक लगाना यानी सदैव प्रभु हमारे साथ हैं— ऐसा अनुभव करना ही है। मार्तंड प्रभु के समक्ष शुरू हुई दिंडी उन्हीं के समक्ष खत्म भी होती है और अंत में दिंडी का प्रसाद पाते हैं। ऐसे ही रात भर दिंडी का आनंद लेने के बाद आखिरकार फिर से घर वापस तो जाना ही पड़ता है, लेकिन हम अकेले घर वापस नहीं जाते— प्रभु का अबीर-रूपी प्रसाद और सालभर का सुखद अनुभव भी घर बांधकर ले जाते हैं।

जो कुछ मैंने लिखा है वो इसलिए नहीं कि मैं कुछ दिखावा कर सकूं। मुझे तो यह ठीक से ज्ञात है कि मैं इस जीवन में प्रभु का श्वान भरोसा के पैरों की धूल की भी बराबरी नहीं कर सकती। बस एक छोटा-सा प्रयास है कि आधुनिकता कहकर गलत आचरण करने वाली इस युवा पीढ़ी को सही मार्ग क्या है— सच में आधुनिकता किस चीज़ में है— और माणिकनगर एवं यहां के उत्सव के बारे में कुछ तो जानकारी दे सकूं, इसी लिये एक छोटा-सा प्रयास। यह मेरा सात दिन सप्ताह में सहभागी होने का अनुभव मैंने बयां करने की कोशिश की है। यदि भावविभोर होकर मैने कुछ अधिक, या कुछ गलत लिखा है, तो दिल से क्षमा चाहती हुं | और यही आनंद हम सभी को जन्मो-जन्मो तक प्राप्त हो— यही मंगल कामना श्री चरणों में करती हूं और इस लेख को विराम देती हूं।

आनंदाचे डोही

गुरुचरणाची
आस लागियेली
निशीदिनी स्मरली
सद्गुरू माऊली

सद्गुरू माऊली
कृपावंत व्हावे
दर्शन घडावे
मज पामरासी

मज पामरासी
भवाब्धी तरावे
मस्तकी ठेवावे
वरदहस्त

वरदहस्ते
असे घडवावे
न्हाउनी निघावे
आनंदाचे डोही

आनंदाचे डोही
शुचिर्भूत व्हावे
एक संघ व्हावे
मन चित्त बुद्धी

मन चित्त बुद्धी
एकवटो यावे
उदास वाटावे
ध्यान इतराचे

ध्यान इतराचे
समूळ गळावे
अंतरी वळावे
वृत्तीच्या धारा

वृत्तीच्या धारा
डोही मिसळावे
आनंदची व्हावे
सबाह्य-अंतरी

सबाह्य-अंतरी
द्वैत न रहावे
तादात्म्य पावावे
गुरुचरणाशी

चरितामृत बोध

श्री माणिक चरितामृत बोध

श्रीप्रभुंना प्राप्त करण्याचा सरळ मार्ग
श्रीमाणिक चरितामृत सहज दाखविते

भक्ती करा मनोहर बयांमामातेसारखी
जी प्रत्यक्ष श्रीदत्तात्रेयांनाही प्रकटवते
सहृद बना त्या गोविंदा गवळ्यासारखे
जे मरणाच्या दारातूनही परत आणते

निस्पृह भूतदया करा भीमाबाईसारखी,
करुणाकर प्रभुस सदासर्वदा तोषविते,
कोमल भक्ती करा काळंभटजीसारखी
जी प्रत्यक्ष सांबालाही समोर प्रकटवते

सत्वपरिक्षेत खरे उतरा दीक्षितांसारखे
जे मलविष्ठेचेही सोने करून दाखविते
अचंचल श्रद्धा ठेवा व्यंकंमादेवीसारखी
जी सामान्यासही देवीपदी पोहोचविते

अनिवार ओढ भेटीची ठेवा प्रभुंसारखी
जी मूर्तीतून सगुण विठ्ठलास प्रकटवते
आत्मज्ञान प्राप्त व्हावे तुकारामासारखे
जी अविलंब समाधीसुख मिळवून देते

धूंद कलासक्त व्हा नाना नाच्यासारखे
जे नृत्यकलेतून हरिभक्तीस फुलविते
हाकेत आर्तता ठेवा व्यापाऱ्यांसारखी
साक्षात बुडणारे गलबतही तरवून नेते

पूर्ण शरणागत व्हावे विठ्ठलरावासारखे
रंकाचाही रावसाहेब करवून दाखविते
निरागस मने प्रेम करा माणक्यासारखे
जे खोल विहरीच्या तळाशीही वाचविते

विश्वास ठेवा गुरुवरी डोंबाऱ्यासारखा
जो पहिलवानासही आस्मान दाखविते
प्रेमभाव हो टेहेळदास माऊलीसारखा
विक्राळ आगीतूनही सलामत वाचविते

चित्तशुद्धीचे सुरेख निधान हाती लागले
जे श्रद्धा ज्ञान आणि भक्तीस वाढविते
श्रीप्रभुंना प्राप्त करण्याचा सरळ मार्ग
श्रीमाणिक चरितामृत सहज दाखविते

भगवंताजवळ काय मागावे?

श्रीजींच्या प्रवचनातून आपण एक गोष्ट अनेकदा ऐकली आहे ती म्हणजे, एका अंध भिकाऱ्याला भगवंत प्रसन्न होतो आणि त्याला एक वर मागण्यास सांगतो. त्यावर तो भिकारी म्हणतो, “भगवंता, माझ्या नातवाला मी राजा म्हणून सोन्याच्या सिंहासनावर बसलेला पाहू इच्छितो!” या एका वरामध्ये त्या अंध भिकाऱ्याने भगवंताकडून अनेक गोष्टी प्राप्त करून घेतल्या. एक तर स्वतःला दृष्टी, स्वतःचे दारिद्रहरण, नातू व्हावा म्हणजे स्वतःचे लग्न, मुलेबाळे, त्यांची लग्न होऊन त्यांना मुलेबाळे. त्यातला एक नातू राजा बनून सोन्याच्या सिंहासनावर बसलेला पाहणे, त्यासाठी लागणारे दीर्घायुष्य, इतक्या सगळ्या गोष्टी त्या भिकाऱ्याने भगवंताकडून एकाच वरात प्राप्त करून घेतल्या.

४७व्या अध्यायात रामचंद्रबुवा सोलापूरकर यांच्या पूर्वजांचा इतिहास ओवी क्रमांक १० ते २८ येथपर्यंत अत्यंत विस्ताराने वर्णन केला आहे. वास्तविक पाहता त्र्यंबकेश्वर या मूळ गावचे यजुर्वेदी ब्राह्मण म्हणून रामचंद्रबुवांचा अगदी त्रोटक उल्लेख करता आला असता. परंतु, बुवांच्या कुळाचा मूळ पुरुष भीकदेवांना त्यावेळच्या परंपरेनुसार तीन आश्रमांनंतर संन्यास घेण्याची इच्छा झाली. परंतु संन्यास दीक्षा आपल्याला प्रत्यक्ष श्रीदत्त महाराजांनी द्यावी, अशी त्यांची इच्छा होती आणि त्यासाठी त्यांनी माहुरगडी अत्यंत घोर तपश्चर्या आणि अनुष्ठान करून प्रत्यक्ष श्रीदत्तांनाच प्रसन्न करून घेतले. श्रीदत्तांनी वर माग, असे म्हणताच, भीकदेवांनी “माझ्या पुढच्या पिढीतील सर्वांना संन्यासदीक्षा घेऊनच चिरसमाधी मिळावी”, अशी याचना केली.

या एकाच वरामध्ये अनेक वरदाने भीकदेवांनी श्रीदत्त महाराजांकडून प्राप्त करून घेतली. ‘माझ्या पुढच्या पिढीतील सर्वांना’ – येथे त्यांनी आपला वंशविस्तार पिढ्यान् पिढ्या सुरू राहील, प्रत्येकाला मुलेबाळे होतील, असा आशीर्वाद प्राप्त करून घेतला. त्याचबरोबर त्यांना संन्यासधर्म स्वीकारल्यावरच समाधी मिळावी, येथे भीकदेवांनी आपल्या वंशातील पुढच्या पिढीच्या दीर्घायुष्याची याचना केलेली दिसते, कारण शास्त्रानुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम,  वानप्रस्थाश्रम आणि संन्यास असे चार आश्रम वर्णिले आहेत आणि प्रत्येक आश्रम स्वीकारून संन्यास घेईपर्यंत जवळपास वृद्धापकाळ जवळ येतो. त्याचप्रमाणे येथे आपली पुढची पिढी ही शास्त्रसंमत धर्माचरण आचरण करेल, असे अभिवचनही भीकदेवाने श्री दत्तात्रेयांकडून मिळविले. आपल्या पुढच्या पिढीने ही धर्मरक्षण करावे, आपल्या परंपरा जपाव्या, धर्ममार्गावर चालावे, ही भीकदेवांची तळमळही आपल्याला येथे जाणवते.

श्री दत्तात्रेयांच्या आशीर्वाद स्वरूप भीकदेवांच्या पुढच्या पिढीत रंगनाथ स्वामी, पूर्णानंद स्वामी, अच्युतानंद स्वामी असे अनेक सिद्ध पुरुष झाले आणि त्या सर्वांनी शेवटी संन्यास दीक्षा घेतली. यातील पूर्णानंदस्वामींनी तर अनेक चमत्कार केले आणि लोकांमध्ये विशेष प्रसिद्ध झाले. रामेश्वरला जाताना सोलापूरच्या पुढे वाटेतच रामचंद्रबुवांच्या मृतप्राय पत्नीलाही श्री माणिकप्रभुंनी जीवदान दिले. पुढे रामचंद्रबुवांनी रामेश्वरला जाण्याचा बेत रहित करून काशीच्या गंगेने श्रीप्रभुंनाच अभिषेक घातला. बुवांची चारधामाची यात्रा रामेश्वर दर्शनाने पूर्ण होणार होती. आधीचे तीन धाम पूर्ण करून, आपली चारधामाची यात्रा रामेश्वरऐवजी माणिकनगरी श्रीप्रभुंचे दर्शन घेऊन पूर्ण केली. यावरून श्रीदत्तांनी दिलेला आशीर्वाद आपल्यला पिढ्यान् पिढ्या फळतो, हेही लक्षात येते.

त्यामुळे आज आपल्याला प्राप्त झालेले गुरुचरण आणि लाभलेली गुरुभक्ती यात आपापल्या पूर्वजांचाही अप्रत्यक्ष सहभाग असतो, हेही आपल्या लक्षात येते. कदाचित त्यांनीही अशीच प्रार्थना त्या वैश्विक शक्तीकडे केली असावी. त्यामुळे आपल्या पूर्वजांचे नित्यनेमे स्मरण करणे, त्यांच्या प्रती कृतज्ञता म्हणून श्राद्धादि कर्मे करणे, हेही आपले कर्तव्य आहे. धर्म रक्षणाच्या, परंपरा जपण्याच्या, छोट्या छोट्या बाबीही ग्रंथकार राघवदासांनी श्रीमाणिक चरितामृतात अगदी विचारपूर्वक गुंफल्या आहेत.

श्री गुरु माझे

श्री गुरु माझे ज्ञानराज महाराज।
सद्गुरू माझे ज्ञानराज महाराज।।

बहु सुखकारक, तिमिर विदारक।
लज्जित भासे व्योमराज।।

रूप सगुण धर, बोधक, गोचर।
प्राप्त सहज गुरुराज।।

निज प्रिय भक्तांसि दर्शवी अव्यक्तासी।
भजवूनि व्यक्त प्रभूराज।।

स्थितप्रज्ञता आणि अचंचल श्रद्धेची मूर्ती

स्थितप्रज्ञता आणि अचंचल श्रद्धेची मूर्ती – श्रीदेवी भगवती व्यंकम्मा

श्री माणिकचरितामृताचे श्रवण, मनन आणि निदीध्यासन करताना चित्तशुद्धी तर होतेच, त्यातील अनेक पात्रे आपल्याभोवती रुंजी घालत राहतात. त्या त्या पात्रांच्या संदर्भात घडलेल्या लीला, त्यातून श्रीप्रभुंनी केलेला निजात्मबोध किंवा त्या लीलेचे उलगडलेले रहस्य जाणून, आपल्या जगण्याचा मार्ग प्रशस्त होत राहतो. श्रीप्रभु चरितामृताचे घुटके घेताना, श्रीदेवी व्यंकम्मा मातेची स्थितप्रज्ञता आणि तिची श्रीप्रभु चरणांवर असलेली अचंचल श्रद्धा, आपल्या हृदयात खोलवर घर करून राहते.

तेविसाव्या अध्यायात कोमटी जातीची, अगदी बालवयांतच वैधव्य पदरी पडलेली, व्यंका बाला आपल्यासमोर येते. श्रीप्रभुंच्या दर्शनाला येत असताना, अवकाळी पावसामुळे आलेल्या पुरात वाहून गेलेला संपूर्ण परिवार, पुराच्या पाण्यात बुडत असताना कुणीतरी हात देऊन पाण्याबाहेर काढून किनाऱ्यावर ठेवलेले, सोबत कुणीही नाही, काय करावे? कुठे जावे? भविष्यात काय वाढून ठेवलाय, याची सुतराम कल्पना नसलेली, व्यापारशून्य झालेली इंद्रिये घेऊन, अवघ्या अकरा वर्षाची ही बालविधवा पोर मैलार येथे श्रीप्रभुंच्या दरबारात येते. मध्यभागी गादीवर बसलेल्या श्रीप्रभुंना पाहून आपल्याला पाण्यातून वाचविणारा हाच तो! हाच मला आता भवसागरातूनही तारेल, अशी व्यंकम्माची मनोमन खात्री पटते. एका कोपऱ्यात बसून तासान तास, नंदी जसा शिवाला पाहतो, तसे एकटक श्रीप्रभुंकडे पाहत बसावे, त्याच आत्मानंदात तृप्त असावे, श्रीप्रभुंच्या दिव्यरूपाशी तासन् तास अनुसंधान साधावे, एवढेच व्यंकम्माला माहीत होते. श्रीप्रभुंच्या प्रसादाची काळजी नाही, की श्रीप्रभु चरणांवर मस्तक ठेवायची इच्छा नाही, देहाची पर्वा नाही, अथवा काही मागणे नाही, केवळ आणि केवळ अनिमिष नेत्रांनी श्रीप्रभुंचे नि:श्चल ध्यान, त्यातच तीचे समाधान! कुण्या शिष्याने हटकल्यावर भानावर येऊन व्यंकम्माने श्रीप्रभुंकडून खारकांचा प्रसाद घेतला आणि बाहेर गेली. दोन-तीन दिवसांनी व्यंकम्मा पुन्हा श्रीप्रभु दरबारी आली. त्यावेळी श्रीप्रभुंनी पुन्हा येण्याचे कारण विचारताच, माझे या जगात कोणीही नसून, अंतरीची तळमळ शांत होण्यासाठी आपल्या परममंगल चरणांशिवाय अन्य कुठलेही स्थळ नाही, हे तिने श्रीप्रभुंना अत्यंत निश्चयपूर्वक सांगितले आणि आपल्याला आसरा देण्यासाठी विनंती केली. परंतु आम्ही फकीर, आमच्याबरोबर राहावयाचे, तर अंगावरचे सर्व दागिने उतरावे लागतील, प्रसंगी भुके राहावे लागेल, अंगाला भस्म फासून राहावे लागेल, असे सांगून श्रीप्रभुंनी व्यंकम्माची पहिल्यांदा परीक्षा पाहिली. परंतु श्रीप्रभु चरणांवाचून अन्य तरणोपाय नाही, हा दृढनिश्चय झालेल्या व्यंकम्माने तात्काळ आपले दागिने उतरवून, अंगी शुभ्र वस्त्र धारण केले आणि कपाळी भस्म चर्चिले, ते जीवनभरासाठीच! श्रीप्रभुंची आज्ञा ही ‘शब्दप्रमाण’ मानून, त्याची जपणूक व्यंकम्माने अगदी प्राणपणाने आजीवन केली. अगदी न्हाणीघरात स्नान करत असताना, ‘असशील तशी निघून ये!’ हा श्रीप्रभुंचा निरोप मिळताच, स्त्रीलज्जेचे भानही न राहता, व्यंकम्मा तशीच नग्न अवस्थेत श्रीप्रभुंकडे धावत निघाली. आपल्या भक्ताचे हे निर्व्याज प्रेम पाहून, तिची तत्परता पाहून श्रीप्रभुंनी आपल्या अंगावरील दुशाला व्यंकम्माला प्रसाद म्हणून लज्जा रक्षणासाठी दिला. श्रीप्रभुंच्या या महावस्ररूपी प्रसादाने व्यंकम्माचे अवघे जीवनच बदलून गेले. ती वृत्तीने नि:संग झाली. आपल्या विरक्त जीवनशैली आणि साधनेने तिने लवकरच श्रीप्रभुंचा विश्वास आणि कृपा संपादन केली. माणिकनगरची स्थापना आणि तेथे कायमचे वास्तव्य करण्यापूर्वी श्रीप्रभु अनेक ठिकाणी भ्रमंती करीत. आपल्याबरोबर चार विश्वासू शिष्य बरोबर ठेवीत. अल्पावधीतच व्यंकम्माने ती योग्यता प्राप्त केली आणि श्रीप्रभुंनी आपल्या मणिचूल पर्वतातील एकांतवासात काही निवडक शिष्याबरोबर व्यंकम्मालाही सोबत घेतले. भालकीच्या घोर अरण्यात श्रीप्रभु व्यंकम्मासहित आपल्या शिष्यांसमावेत आठ आठ दिवस समाधी लावून बसत. याच एकांतवासादरम्यान श्रीप्रभुंनी व्यंकम्मास योगासने आणि समाधी कशी लावावी, हे शिकविले! एका सामान्य बालिकेपासून योगिनी बनण्याचा व्यंकम्माचा प्रवास आता श्रीप्रभुंच्या सान्निध्यात प्रशस्त होत होता.

बिदरच्या मुक्कामात असताना, सर्व जातीच्या भक्तांनी श्रीप्रभुंना आपापल्या घरी येऊन पूजा स्वीकारण्याचा आग्रह केला. त्यावेळेस सर्व भक्तांना श्रीप्रभुंनी मी उद्या माध्यान्हसमयी आपणाकडे येतो, असे आश्वासन दिले. माध्यान्ह समयी सूर्य डोक्यावर आला, तरी झरणी नृसिंहाच्या आपल्या मुक्कामाच्या ठिकाणी श्रीप्रभु स्वस्थ पडून होते. सर्व भक्तांमध्ये बिदरनगरामध्ये पाद्य पूजेसाठी जाण्यासंदर्भात चलबिचल सुरू झाली. श्रीप्रभु अजूनही उठले नाहीत, म्हणून कुजबुज सुरू झाली. व्यंकम्मा मात्र एका कोपऱ्यात स्वस्थ बसून श्रीप्रभु नामाचा जप करीत होती. त्याचवेळी श्रीप्रभुंनी योगमायेने विश्वरूप धारण करून एकाच वेळी अनेक भक्तांच्या घरी पूजा स्वीकारल्या. थोड्यावेळाने सर्व भक्त पुन्हा श्रीप्रभुंकडे येताच, श्रीप्रभुंच्या योगशक्तीचा उलगडा झाला. अशावेळी शिष्यांमध्ये जरी चलबिचल होती, तरी व्यंकम्मा मात्र त्याही परिस्थितीत स्थितप्रज्ञ राहिली.

एका ब्राह्मण दांपत्यास वृद्धत्व आले, तरी त्यांना पुत्रसंतान नव्हते. श्रीप्रभुंची त्यांच्यावर विशेष प्रीती होती. एकदा ते दांपत्य भेटीस आले असता, त्यावेळेस व्यंकम्माही तेथे आली. श्रीप्रभुंनी व्यंकम्माला चार दिवस न येण्याचे कारण विचारले. त्यावर स्त्रीधर्मानुसार चार दिवस अडचणीचे असल्यामुळे, दर्शनास येता आले नाही, असे व्यंकम्माने श्रीप्रभुंना सांगितले. त्यावेळी श्रीप्रभुंनी व्यंकम्मास, ‘तुला कंटाळा आला असेल, तर तुझ्या मासिक पाळीचे दान या सत्पात्र पात्र ब्राह्मणपत्नीला देऊन मोकळी हो,’ असे सांगितले. येथेही श्रीप्रभुआज्ञा प्रमाण मानून व्यंकम्माने आपल्या हातून त्या वृद्ध ब्राह्मण स्त्रीच्या हातावर पाणी सोडले आणि तिला रजोनिवृत्ती मिळाली.

टेहेळदास नावाचा श्रीप्रभुंचा एक अभिमानी भक्त होता.व त्याची माता साधारणत: सव्वाशे वर्षांची होती. श्रीप्रभु कधीकधी तिच्या भेटीसाठी तिच्या झोपडीत जात. एके दिवशी श्रीप्रभु टेहेळदासाच्या आईच्या झोपडीत तिच्याशी सुखसंवाद करीत असता, एकाएक झोपडीला आग लागली. त्या आगेच्या प्रभावाने बाजूच्या झोपड्यांनीही पेट घेतला. सगळीकडे एकच आगडोंब उसळला. श्रीप्रभु आगीमध्ये सापडले, ही वार्ता संपूर्ण माणिकनगरात पसरली. सर्वत्र एकच हाहाकार माजला. सर्व लोकांप्रमाणे श्रीप्रभुंचे बंधूही आग विझविण्यासाठी सरसावले. या प्रचंड आगीमध्ये टेहेळदासाच्या आईसहित श्रीप्रभुही आगीच्या भक्षस्थानी पडले असावेत, अशी शंका, ती भयंकर आग पाहून, अनेक लोकांच्या मनात आली. या हलकल्लोळातही व्यंकम्मा मात्र प्रलयकाळातही स्थिर असणाऱ्या एखाद्या योग्याप्रमाणे श्रीप्रभुगादी जवळ बसून निजानंदात निमग्न झाली होती. पंचमहाभूतांवर सत्ता असणाऱ्या निरालंब, निर्गुण, निरंजन, परिपूर्ण अशा श्रीप्रभुला अग्नी बाधा तो काय करू शकणार? असा ठाम विश्वास केवळ व्यंकम्माच्या ठायींच होता आणि म्हणूनच ती आपल्या जागी स्वस्थचित्त राहिली.

श्री हनुमंत दादा महाराज, मातोश्री श्री बयांमादेवी आणि श्रीनृसिंह तात्या महाराजांची समाधी झाल्यावर, आपणही श्रीप्रभुंच्या आधी समाधीस्थ व्हावे, ही व्यंकम्माची इच्छा होती. आणि श्रावण वद्य त्रयोदशीची मंगलवेळा साधून, अहोरात्र भजनात घालवून, देवी व्यंकम्मा निश्चेष्टित होऊन पडली. व्यंकम्माचे निर्वाण झाले, असे समजून तिच्या कोमटी जातीच्या लोकांनी तिच्या अंत्यसंस्काराची तयारी केली. परंतु तिला हात लावताच, तिच्या तोंडातून ॐकार ध्वनी ऐकू येई. जिवंतपणाचे कोणतेही लक्षण व्यंकम्मात दिसत नव्हते. परंतु कोमटी लोकांनी हात लावताच तिच्या देहातून ॐकार ध्वनी ऐकू येई. त्यावेळेस व्यंकम्माचे अंतःकरण श्रीप्रभुंनी तात्काळ ओळखले. आपला अंत्यसंस्कार वैदिक पद्धतीने व्हावा, अशी तिची इच्छा असल्याचे श्रीप्रभुंनी सर्वांना सांगितले. त्याप्रमाणे श्रीप्रभुंच्या सेवेकरी ब्रह्मवृंदाकडून व्यंकम्माच्या अंत्यसंस्काराची तयारी केली गेली. प्रथमत: स्नान घालून, व्यंकम्मास शुभ्र चोळीपातळ नेसविण्यात आले. सर्वांगाला भस्म चर्चिले गेले, कपाळी शुभ्र गंधाचा टिळा आणि गळ्यामध्ये रुद्राक्ष माळा घातल्या गेल्या. त्यावेळी व्यंकमा एखाद्या निर्मळ योगिनीप्रमाणे भासत होती. श्रीप्रभु आपल्याजवळ असल्याचे जाणून, व्यंकम्मा आपल्या जागेवरून उठली, तिने श्रीप्रभुंना अत्यंत मनोभावे नमस्कार केला. श्रीप्रभुंचे चरण घट्ट पकडले आणि पुन्हा मांडी घालून व्यंकम्मा योगासनात बसली, ती कायमचीच! व्यंकम्माच्या समाधीनंतर तिचे मंदिर बांधावे किंवा कसे, अशी विचारणा करताच श्रीप्रभु म्हणाले, ‘तिच्या सामर्थ्याने तीच आपले मंदिर उभारून घेईल!’ परमविदुषी श्रीदेवी व्यंकम्माचे भव्य मंदिर आजही आपल्याला माणिकनगरी पहावयास मिळते. भक्तांच्या सर्व मनोकामना पूर्ण करणारी, श्रीदेवी व्यंकम्मा ही श्रीदत्तात्रयांची मधुमती शक्तीच आहे, अशी मान्यता सर्व भक्तांमध्ये आहे. नराचा नारायण होणे म्हणजे नेमके काय, हे आपल्याला स्थितप्रज्ञ, श्रीप्रभु चरणांवर अचंचल श्रद्धा आणि श्रीप्रभु वचनांवर अढळ विश्वास असणाऱ्या, श्रीदेवी व्यंकम्माच्या चरित्रातून अनुभवता येते. या सद्गुणांच्या जोरावरच कोमटी जातीतील एक सामान्य व्यंका बालिका अखेरीस श्रीदेवीपदास पोहोचली.

विश्वपालिनी जगदंबे की जय!!!
श्री मधुमती शामलांबा माते की जय!!!
श्री व्यंकम्मा देवीचा उदो उदो!!!