मंगलवार ६ अक्तूबर २००९ की रात्रि को श्रीमत्सद्गुरु सिद्धराज माणिकप्रभु महाराज प्रभुस्वरूप में लीन हो गए। गुरुवार ८ अक्तूबर २००९ की दोपहर समाधि की विधि संपन्न हुई। अब प्रश्न था श्रीजी की समाधि पर एक तात्कालिक देवालय का। ९ अक्तूबर की रात्रि को खुले आसमान के नीचे श्रीजी की समाधि के सामने माणिकनगर के ग्रामवासी भजन कर रहे थे। तभी उन में से कुछ लोगों ने यह निर्णय किया कि माणिकनगर के सभी ग्रामवासी मिलकर यदि देवालय के कार्य में पूरी लगन से जुट जाएंगे तो देवालय का निर्माणकार्य १८ अक्तूबर को होनेवाली श्रीजी की आराधना से पूर्व पूर्ण हो सकता है।

केवल ८ दिन का ही समय था तथापि सभी ग्रामवासियों ने निर्णय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, देवालय का निर्माण ८ दिन में अवश्य पूर्ण करेंगे। सभी ग्रामवासियों ने श्री ज्ञानराज माणिकप्रभु महाराज को अपना निर्णय सुनाया‌ किंतु वे स्वयं कोई भी निर्णय लेने की अवस्था में नहीं थे। ‘मौनं स्वीकृति लक्षणं’ इस न्याय से माणिकनगर के पुरुषों ने, स्त्रियों ने, बालकों ने और युवकों ने १० अक्तूबर के दिन श्रमदान प्रारंभ किया।देवालय के लिए लगनेवाली संपूर्ण सामग्री का प्रबंध भी ग्रामवासियों ने ही किया। ‘कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा’ इस कहावत के अनुसार सारी सामग्री अपने आप जुट गई। माणिकनगर के हजारों हाथों ने दिन-रात.परिश्रम करके १७ अक्तूबर की रात समाधि सहित श्रीजी के देवालय के निर्माणकार्य को पूरा कर दिया।१८ अक्तूबर के दिन इस नवनिर्मित देवालय में श्रीजी की आराधना अत्यंत वैभव के साथ संपन्न हुई। रामायण में जिस प्रकार वानरों ने सेतु का निर्माण किया था उसी प्रकार माणिकनगर वासियों ने श्रीजी के देवालय का निर्माण किया। इसीलिए श्रीजी मज़ाक में कहा करते थे “सारे जहां के बंदर, माणिकनगर के अंदर!”