जैसे की आप सभी को अवगत है की हम सभी का प्रिय वेदांत सप्ताह महोत्सव आने वाला है। वेदांत सप्ताह का वर्णन यदि मैं शब्दों में कर सकती हूं, ऐसा कहना मेरी मूर्खता होगी। बस मैं एक प्रयास करूंगी कि आपकी ओर मेरी भावनाएं संक्षिप्त शब्दों में साझा कर सकूं।
यदि आप सभी को अवगत है कि वृंदावन पर बहुत ही सुंदर रचना है कि— “मेरो मन वृंदावन में अटको, मेरो मन हरि चरणन में अटको।” वैसे ही हम सभी प्रभु भक्तों के लिये यह रचना सुनते ही प्रभु के स्थान यानी माणिकनगर की याद आती है। उसी पावन क्षेत्र में होने वाला वेदांत सप्ताह यानी मार्तंड प्रभु ने बताए हुए सप्ताह के अत्यंत सरल क्रम, जो हमें सच में प्रभु तक ले जाने में मदद करते हैं।

उन सात दिनों में प्रभु चरित्र, गुरु चरित्र का पारायण, श्रीजी की अमृत वाणी से भगवद्गीता का अध्ययन, बाल गोपाल क्रीड़ा, साप्ताहिक भजन, और अंत में अत्यंत भव्य दिव्य दिंडी से इस कार्यक्रम का समारोप होता है।

प्रभु चरित्र पारायण— प्रभु की कृपा से मुझे एक बार अवसर प्राप्त हुआ कि मैं उनका ही चरित्र उनके ही क्षेत्र में बैठकर पढ़ और समझ सकूं। वो औदुंबर की शीतल छाया, पास में ही हमारे प्रभु की समाधि यानी स्वयं प्रभु महाराज, ब्राह्मणों के द्वारा विस्तृत मंत्र-पाठ करते हुए हमारे प्रभु की नित्य पूजा, और शांति से हमारा पढ़ना। क्या यह अनुभव आपको साधारण लगता है? यदि आपका जवाब हां है तो क्षमा चाहती हूं, पर आपने सच में पारायण तो किया ही नहीं है। अरे, कितना सामर्थ्य उस जगह में! जब पारायण करने की इच्छा घर में होती है तो कलश आदि सभी चीज़ों का प्रबंध करना पड़ता है। पर यहां तो स्वयं हमारे श्री प्रभु ही विराजमान हैं, तो उस कलश की आवश्यकता ही नहीं है। बस वहां एक ही अनुभव होता है। प्रभु महाराज स्वयं हमारे समक्ष हैं, उनका चरित्र हाथ में है, आंखें पढ़ने का काम कर रही हैं, दिमाग समझकर मन को जागृत कर उस प्रभु की लीलाओं का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा है, और आंखें नम हो रही हैं उस प्रभु की महिमा से। यह अनुभव थोड़ा बहुत घर में होता है, पर कहते हैं ना— “क्षेत्राची महिमाच वेगळी असते।” तो बस यही बात है। मैं तो हर जन्म-जन्म तक यहां पारायण करने का सुख प्राप्त करना चाहूंगी और मेरे प्रभु की लीलाओं का स्मरण कर उन्हें और भी जानना चाहूंगी।

फिर बारी आती है श्रीजी से कुछ ज्ञान प्राप्त करने की, यानी वेदांत शिक्षा शिबिर की। सप्ताह का नाम भी वेदांत है तो वेदांत शास्त्र का थोड़ा-बहुत ज्ञान हम श्रीजी से प्राप्त करते हैं। थोड़ा-बहुत इसलिए कह रही हूं कि वो ज्ञानस्वरूप श्रीजी तो ज्ञान का सागर हैं ही, पर हम भी तो मूढ़-मति का सागर ही हैं, जो थोड़ा-बहुत ही समझ पाते हैं। मुझे तो उन श्रीजी की दयालुता पर भी दया आती है कि उन्हें भी यह ज्ञात है कि हमें कुछ समझ आता नहीं है, फिर भी इतनी आसान भाषा में समझाते हैं। उनकी यही दया हमें और मन लगाकर सुनने-समझने का सामर्थ्य देती है। सच में धन्य हैं हमारे श्रीजी, जो इतने मूढ़ शिष्यों का उद्धार करने हेतु उस सिंहासन पर हाथों में भगवद्गीता, अधरों पर प्यारा-सा स्मितहास्य लेकर विराजमान हुए हैं। उस समय हमें सच में गुरुकुल में होने का अनुभव होता है। 2 घंटे बिना रुके हमें समझाना, और यदि अध्याय 7 दिनों में समाप्त नहीं हो पा रहा तो extra class है, सभी को आना है— ऐसा संदेश सुबह की क्लास में ही देना। “हो म्हणा, मी म्हणून सांगतो, ते ही फुकट सांगतो।” ऐसे विविध बातों से हंसाते-हंसाते ज्ञान प्राप्त करवाने की कला सिर्फ हमारे श्रीजी में ही है। सप्ताह के आखिरी दिन सभी लोग श्रीजी को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, श्रीजी के प्रति उनका प्रेम प्रकट करते हैं। किंतु आखिरी के दिन मेरा मन तो सिर्फ श्रीजी से क्षमा मांगने का करता है कि इतना सब कुछ ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मैं उसे आत्मसात नहीं कर पाई। इसका अर्थ यह भी नहीं कि एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर, पर बहुत थोड़ा कर पाई— इसी का दुख रहता है। यह अनुभव बहुत ही अविस्मरणीय और अतुलनीय है। पर श्रीजी के चरणों में अंत में यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा हम पर सदा बनी रहे और वो जो कुछ हमें बता रहे हैं उसे हम समझ सकें, और सिर्फ समझें नहीं तो उसे आत्मसात भी कर सकें।

अब वह घटिका का समय है जहां हम माणिकनगर में श्री कृष्ण के गोकुल का भी दर्शन कर सकते हैं। अरे हां, गोकुल— सत्य सुना है। कैसे, वो बताती हूं। जैसे गोकुल में कान्हा बाल गोपाल क्रीड़ा करते हैं, ठीक वैसे ही हमारे माणिकनगर में भी बाल गोपाल क्रीड़ा यानी कोल का भी आयोजन होता है। सप्ताह के हर दिन के हिसाब से सब लोग एक ही रंग के कपड़े पहनकर उस दत्तलोक में क्रीड़ा करते हैं तो वह दृश्य अत्यंत रमणीय होता है। बस देखते ही रहो— ऐसा ही लगता है। उस प्रभु समाधि के समक्ष विविध पीठाधीशों के द्वारा रचे गए भजनों का गायन करते हुए इतनी गर्मी में नाचना कोई आम इंसान का काम नहीं है; उसके लिए सच में प्रभु से प्रेम होने की आवश्यकता है। उन सभी कोल खेलने वाली स्त्रियों में कृष्ण-प्रेम में नाचने वाली मीरा बाई दिखती हैं, तो पुरुषों में सभी संतों का अनुभव होता है। कई लोगों को लगता होगा कि मैं ये क्या कह रही हूं। वो खेलने वाले लोगों में से बहुत से लोग तो कितने दुर्गुणी होते हैं। उनको मीरा बाई और संतों की उपमा देना सही नहीं है। अरे, पर हमारा उद्देश्य तो उन सब में प्रभु को ही देखना है। वो सब हमारे प्रभु के शिष्य हैं। जैसे नाना नाच्या के दुर्गुणों को सद्गुणों में बदलने का सामर्थ्य हमारे प्रभु में है, तो वो सभी भी हमारे प्रभु के ही आश्रित हैं। तो मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। यह क्रीड़ा सात दिन तक चलती है, और आठवें यानी दिंडी के दिन इतनी मध्य-रात्रि तक खड़े रहकर, दिंडी में सहभागी होकर भी, उतने ही उल्लास से बिना थके वह दिंडी में भी रात्री में कोल खेलते हैं। तो सच में इन सभी के रूपों में सभी संत, महात्मा, देवी-देवता आदि सभी आकर हमारे दिंडी के कार्यक्रम का आनंद लेते हुए, हमारे प्रभु महाराज का भक्त परिवार का वैभव देखकर, हमारे प्रभु की स्तुति करते हुए वही दांडिया लेकर नाचते हैं— यही मेरा विश्वास है। इन सभी भक्त-जनों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम, जो इतने उल्लास से भक्ति कर रहे हैं।

अब रात्री में फिर से श्रीजी की अमृत वाणी सुनने के पश्चात अब बारी आती है हम सभी के प्रिय क्षण की, यानी साप्ताहिक भजन की। हमारे संप्रदाय में जब भी पारायण किया जाता है तो रात्री में सातवारिक भजन होना भी जरूरी माना गया है। माणिकनगर में प्रभु के समक्ष पारायण करने के पश्चात रात्री में प्रभु एवं प्रभु के ज्ञानस्वरूप के साथ भजन करने का आनंद अकेले घर में पारायण और भजन करने से कई गुणा अधिक है। आधे घंटे तो सिर्फ “गणराज पायी” यही पद चलता है। वैसे हमें न कोई राग आता है, न ही हमें उनके साथ भजन गाना आता है। पर बस आनंदराज महाराज की मधुर आवाज सुनने से ही हमें भी हम ही गा रहे हैं— ऐसी अनुभूति ही हमारे लिये पर्याप्त है। भजन ताल में गाना नहीं आता, फिर भी जो हर एक व्यक्ति के भीतर भजन को गाने की इच्छा होती है, वो मुझे इस पंक्ति की याद दिलाती है कि— “वेडे वाकडे गाईन, परी तुझा दास होईन।” बेचारे प्रभु कितने दिनों से इस बेसुरी आवाज को झेल रहे हैं, वो केवल उस भक्त के प्रेम हेतु। रात्री में भजन, आरती, उपदेश रत्नमाला का श्रीजी के साथ पठण, प्रसाद— यह सारी चीज़ें अत्यंत ही भक्तीमय अनुभव कराने वाली हैं। श्रीजी जब घर वापस लौटते हैं तो “कमल वदनी हे” इस पद का गायन होता है। तो दिल भर आता है कि गया आज का भी दिन गया। पर इस बावले मन को— अरे शांत हो जा, अभी तो रात भर की दिंडी भी बाकी है— ऐसा खिलौना देकर शांत करते हैं।

आखिरकार सात दिन बितने के बाद आठवें दिन की दिंडी का दिन भी आ ही जाता है। उससे भी पहले माणिक क्विज़ का आयोजन होता है। ‘खेल-खेल में जानो प्रभु को’ यह उद्देश्य सच में संप्रदाय और प्रभु के बारे में हर साल कुछ नया बता कर ही जाता है।
हमारे मन में तो ऐसे भी भ्रम हैं कि यदि किसी को सारी रचनाएं कंठस्थ हैं तो उसे सब कुछ अवगत है। पर ऐसा नहीं है। क्या मात्र रचनाएं कंठस्थ होने से हम सच में प्रभु के बारे में जान पाएंगे? यह तो वही बात हुई जैसे श्रीजी ने उनके प्रवचन में कथा बताई थी। जब एक साधु कुछ पक्षियों को सिखाने का प्रयास करता है कि शिकारी आएगा, दाना डालेगा, पर तुम्हें जाल में नहीं फंसना है। यह कंठस्थ करा लेता है और वे पक्षी भी जड़-बुद्धि यह बोलते-बोलते उस जाल में फंस जाते हैं। तो हमने भी क्या अलग किया है? हमने भी हमारे गुरु के द्वारा की गई रचना का सार समझकर— माया के जाल में मत फंसो, प्रभु को प्राप्त करो— यह उपदेश कंठस्थ कर, हमने भी जाल में छलांग तो लगाई ही है। और फिर हमें सारी रचनाएं कंठस्थ हैं— इसका अहंकार तो अलग ही है। एवं हमारे मार्तंड प्रभु भी तो कहते है कि— “मी मोठा दंभ हा हटवा। हे वय जाते अहा हा हा॥” इसका अर्थ यह नहीं कि रचनाएं कंठस्थ करना गलत है। वो तो बहुत ही अच्छी बात है कि आपको आधुनिक गानों से ज़्यादा प्रभु की रचनाएं कंठस्थ करना पसंद है, एवं मैं भी उन्हीं में से एक हूं। किंतु मैं बस यही कहना चाहती हूं कि सिर्फ रचनाएं ज्ञात हैं— इस आधार पर हम प्रभु और संप्रदाय के बारे में सब जानते हैं, इस झूठे ताज का दिखावा करने की बजाय, चलो सच में उस प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानने की कोशिश करते हैं और इस सप्ताह में सहभागी होते हैं। शरनांगत होकर, इस सकलमत के मेले में कभी आइये‌ तो सही, यहा सारे विकार नष्ट करणे वाली दुकाने प्रभु ने लगाई रखी है | बस उस दुकानदार प्रभु से सही चीज मांग लेना | वो सदैव उत्कृष्ट ही देते है | यदि हम प्रभु को जान गए तो और कुछ जानना बाकी ही नहीं रहेगा। मैं तो स्वयं से यह बात स्वीकार करना चाहूंगी कि थोड़ी-बहुत रचनाएं मुझे भी कंठस्थ हैं, पर मैं संप्रदाय और प्रभु के बारे में बहुत कम जानती हूं। जीवन में पढ़ाई समाप्त होने के बाद मेरा पहला लक्ष्य प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानना यही होगा। माणिक क्विझ एक ऐसा आयोजन है जो हमें संप्रदाय के बारे मे बहुत जाणकारी देता है | स्क्रीन पर चैतन्यराज महाराज की मधुर ओर भावविभोर आवाज मे संप्रदाय की सारी जानकारी ग्रहण करने में बहुत ही आसानी होती है | वो हर बार कइ ऐसी बाते बताते है जो सिर्फ उस दीन ही हमने सुनी होती है | इसका सारा श्रेय चैतन्यराज महाराज को ही जाता है, जो हमें संप्रदाय के प्रति इतना आकर्षित कर रहे है |

फिर 11 बजे मार्तंड प्रभु की समाधि के समक्ष से दिंडी का आरंभ होता है, तो 12 घंटे चलने वाली दिंडी रुकती ही नहीं है। श्रीजी के करकमलों से अबीर का आनंद लेते हुए निश्चित स्थान पर निश्चित पद गाया जाता है। वो गाते-गाते कब एकदम काली रात सुबह की न सहने वाली धूप में बदल जाती है— उसका पता मुझे आज तक नहीं चला। ज़रा सोचकर देखिए— जिन पदों का अर्थ भी हमें समझ नहीं आता, फिर भी हम इतने झूम उठते हैं; तो उन्हीं पदों का श्रीजी को अर्थ समझ आता है तो वो तो कितने आनंदित होते होंगे ना! हमारे मार्तंड प्रभु कहते हैं, वो एकदम सच है— “नाही स्वर्गी, वैकुंठी हे सुख।” यह सुख केवल और केवल माणिकनगर में ही है। श्रीजी के दर्शन पाकर उनके हाथों से अबीर डलवा लेना यानी जीवन भर की चिंताओं से मुक्त होना ही है। वही अबीर थोड़ा-सा प्रसाद-रूपी घर लेकर आना और यदि कोई घर में बीमार हो तो उसे श्रद्धापूर्वक लगाना यानी सदैव प्रभु हमारे साथ हैं— ऐसा अनुभव करना ही है। मार्तंड प्रभु के समक्ष शुरू हुई दिंडी उन्हीं के समक्ष खत्म भी होती है और अंत में दिंडी का प्रसाद पाते हैं। ऐसे ही रात भर दिंडी का आनंद लेने के बाद आखिरकार फिर से घर वापस तो जाना ही पड़ता है, लेकिन हम अकेले घर वापस नहीं जाते— प्रभु का अबीर-रूपी प्रसाद और सालभर का सुखद अनुभव भी घर बांधकर ले जाते हैं।

जो कुछ मैंने लिखा है वो इसलिए नहीं कि मैं कुछ दिखावा कर सकूं। मुझे तो यह ठीक से ज्ञात है कि मैं इस जीवन में प्रभु का श्वान भरोसा के पैरों की धूल की भी बराबरी नहीं कर सकती। बस एक छोटा-सा प्रयास है कि आधुनिकता कहकर गलत आचरण करने वाली इस युवा पीढ़ी को सही मार्ग क्या है— सच में आधुनिकता किस चीज़ में है— और माणिकनगर एवं यहां के उत्सव के बारे में कुछ तो जानकारी दे सकूं, इसी लिये एक छोटा-सा प्रयास। यह मेरा सात दिन सप्ताह में सहभागी होने का अनुभव मैंने बयां करने की कोशिश की है। यदि भावविभोर होकर मैने कुछ अधिक, या कुछ गलत लिखा है, तो दिल से क्षमा चाहती हुं | और यही आनंद हम सभी को जन्मो-जन्मो तक प्राप्त हो— यही मंगल कामना श्री चरणों में करती हूं और इस लेख को विराम देती हूं।

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