वेदांत सप्ताह महोत्सव

जैसे की आप सभी को अवगत है की हम सभी का प्रिय वेदांत सप्ताह महोत्सव आने वाला है। वेदांत सप्ताह का वर्णन यदि मैं शब्दों में कर सकती हूं, ऐसा कहना मेरी मूर्खता होगी। बस मैं एक प्रयास करूंगी कि आपकी ओर मेरी भावनाएं संक्षिप्त शब्दों में साझा कर सकूं।
यदि आप सभी को अवगत है कि वृंदावन पर बहुत ही सुंदर रचना है कि— “मेरो मन वृंदावन में अटको, मेरो मन हरि चरणन में अटको।” वैसे ही हम सभी प्रभु भक्तों के लिये यह रचना सुनते ही प्रभु के स्थान यानी माणिकनगर की याद आती है। उसी पावन क्षेत्र में होने वाला वेदांत सप्ताह यानी मार्तंड प्रभु ने बताए हुए सप्ताह के अत्यंत सरल क्रम, जो हमें सच में प्रभु तक ले जाने में मदद करते हैं।

उन सात दिनों में प्रभु चरित्र, गुरु चरित्र का पारायण, श्रीजी की अमृत वाणी से भगवद्गीता का अध्ययन, बाल गोपाल क्रीड़ा, साप्ताहिक भजन, और अंत में अत्यंत भव्य दिव्य दिंडी से इस कार्यक्रम का समारोप होता है।

प्रभु चरित्र पारायण— प्रभु की कृपा से मुझे एक बार अवसर प्राप्त हुआ कि मैं उनका ही चरित्र उनके ही क्षेत्र में बैठकर पढ़ और समझ सकूं। वो औदुंबर की शीतल छाया, पास में ही हमारे प्रभु की समाधि यानी स्वयं प्रभु महाराज, ब्राह्मणों के द्वारा विस्तृत मंत्र-पाठ करते हुए हमारे प्रभु की नित्य पूजा, और शांति से हमारा पढ़ना। क्या यह अनुभव आपको साधारण लगता है? यदि आपका जवाब हां है तो क्षमा चाहती हूं, पर आपने सच में पारायण तो किया ही नहीं है। अरे, कितना सामर्थ्य उस जगह में! जब पारायण करने की इच्छा घर में होती है तो कलश आदि सभी चीज़ों का प्रबंध करना पड़ता है। पर यहां तो स्वयं हमारे श्री प्रभु ही विराजमान हैं, तो उस कलश की आवश्यकता ही नहीं है। बस वहां एक ही अनुभव होता है। प्रभु महाराज स्वयं हमारे समक्ष हैं, उनका चरित्र हाथ में है, आंखें पढ़ने का काम कर रही हैं, दिमाग समझकर मन को जागृत कर उस प्रभु की लीलाओं का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा है, और आंखें नम हो रही हैं उस प्रभु की महिमा से। यह अनुभव थोड़ा बहुत घर में होता है, पर कहते हैं ना— “क्षेत्राची महिमाच वेगळी असते।” तो बस यही बात है। मैं तो हर जन्म-जन्म तक यहां पारायण करने का सुख प्राप्त करना चाहूंगी और मेरे प्रभु की लीलाओं का स्मरण कर उन्हें और भी जानना चाहूंगी।

फिर बारी आती है श्रीजी से कुछ ज्ञान प्राप्त करने की, यानी वेदांत शिक्षा शिबिर की। सप्ताह का नाम भी वेदांत है तो वेदांत शास्त्र का थोड़ा-बहुत ज्ञान हम श्रीजी से प्राप्त करते हैं। थोड़ा-बहुत इसलिए कह रही हूं कि वो ज्ञानस्वरूप श्रीजी तो ज्ञान का सागर हैं ही, पर हम भी तो मूढ़-मति का सागर ही हैं, जो थोड़ा-बहुत ही समझ पाते हैं। मुझे तो उन श्रीजी की दयालुता पर भी दया आती है कि उन्हें भी यह ज्ञात है कि हमें कुछ समझ आता नहीं है, फिर भी इतनी आसान भाषा में समझाते हैं। उनकी यही दया हमें और मन लगाकर सुनने-समझने का सामर्थ्य देती है। सच में धन्य हैं हमारे श्रीजी, जो इतने मूढ़ शिष्यों का उद्धार करने हेतु उस सिंहासन पर हाथों में भगवद्गीता, अधरों पर प्यारा-सा स्मितहास्य लेकर विराजमान हुए हैं। उस समय हमें सच में गुरुकुल में होने का अनुभव होता है। 2 घंटे बिना रुके हमें समझाना, और यदि अध्याय 7 दिनों में समाप्त नहीं हो पा रहा तो extra class है, सभी को आना है— ऐसा संदेश सुबह की क्लास में ही देना। “हो म्हणा, मी म्हणून सांगतो, ते ही फुकट सांगतो।” ऐसे विविध बातों से हंसाते-हंसाते ज्ञान प्राप्त करवाने की कला सिर्फ हमारे श्रीजी में ही है। सप्ताह के आखिरी दिन सभी लोग श्रीजी को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, श्रीजी के प्रति उनका प्रेम प्रकट करते हैं। किंतु आखिरी के दिन मेरा मन तो सिर्फ श्रीजी से क्षमा मांगने का करता है कि इतना सब कुछ ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मैं उसे आत्मसात नहीं कर पाई। इसका अर्थ यह भी नहीं कि एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर, पर बहुत थोड़ा कर पाई— इसी का दुख रहता है। यह अनुभव बहुत ही अविस्मरणीय और अतुलनीय है। पर श्रीजी के चरणों में अंत में यही प्रार्थना है कि उनकी कृपा हम पर सदा बनी रहे और वो जो कुछ हमें बता रहे हैं उसे हम समझ सकें, और सिर्फ समझें नहीं तो उसे आत्मसात भी कर सकें।

अब वह घटिका का समय है जहां हम माणिकनगर में श्री कृष्ण के गोकुल का भी दर्शन कर सकते हैं। अरे हां, गोकुल— सत्य सुना है। कैसे, वो बताती हूं। जैसे गोकुल में कान्हा बाल गोपाल क्रीड़ा करते हैं, ठीक वैसे ही हमारे माणिकनगर में भी बाल गोपाल क्रीड़ा यानी कोल का भी आयोजन होता है। सप्ताह के हर दिन के हिसाब से सब लोग एक ही रंग के कपड़े पहनकर उस दत्तलोक में क्रीड़ा करते हैं तो वह दृश्य अत्यंत रमणीय होता है। बस देखते ही रहो— ऐसा ही लगता है। उस प्रभु समाधि के समक्ष विविध पीठाधीशों के द्वारा रचे गए भजनों का गायन करते हुए इतनी गर्मी में नाचना कोई आम इंसान का काम नहीं है; उसके लिए सच में प्रभु से प्रेम होने की आवश्यकता है। उन सभी कोल खेलने वाली स्त्रियों में कृष्ण-प्रेम में नाचने वाली मीरा बाई दिखती हैं, तो पुरुषों में सभी संतों का अनुभव होता है। कई लोगों को लगता होगा कि मैं ये क्या कह रही हूं। वो खेलने वाले लोगों में से बहुत से लोग तो कितने दुर्गुणी होते हैं। उनको मीरा बाई और संतों की उपमा देना सही नहीं है। अरे, पर हमारा उद्देश्य तो उन सब में प्रभु को ही देखना है। वो सब हमारे प्रभु के शिष्य हैं। जैसे नाना नाच्या के दुर्गुणों को सद्गुणों में बदलने का सामर्थ्य हमारे प्रभु में है, तो वो सभी भी हमारे प्रभु के ही आश्रित हैं। तो मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ गलत है। यह क्रीड़ा सात दिन तक चलती है, और आठवें यानी दिंडी के दिन इतनी मध्य-रात्रि तक खड़े रहकर, दिंडी में सहभागी होकर भी, उतने ही उल्लास से बिना थके वह दिंडी में भी रात्री में कोल खेलते हैं। तो सच में इन सभी के रूपों में सभी संत, महात्मा, देवी-देवता आदि सभी आकर हमारे दिंडी के कार्यक्रम का आनंद लेते हुए, हमारे प्रभु महाराज का भक्त परिवार का वैभव देखकर, हमारे प्रभु की स्तुति करते हुए वही दांडिया लेकर नाचते हैं— यही मेरा विश्वास है। इन सभी भक्त-जनों को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम, जो इतने उल्लास से भक्ति कर रहे हैं।

अब रात्री में फिर से श्रीजी की अमृत वाणी सुनने के पश्चात अब बारी आती है हम सभी के प्रिय क्षण की, यानी साप्ताहिक भजन की। हमारे संप्रदाय में जब भी पारायण किया जाता है तो रात्री में सातवारिक भजन होना भी जरूरी माना गया है। माणिकनगर में प्रभु के समक्ष पारायण करने के पश्चात रात्री में प्रभु एवं प्रभु के ज्ञानस्वरूप के साथ भजन करने का आनंद अकेले घर में पारायण और भजन करने से कई गुणा अधिक है। आधे घंटे तो सिर्फ “गणराज पायी” यही पद चलता है। वैसे हमें न कोई राग आता है, न ही हमें उनके साथ भजन गाना आता है। पर बस आनंदराज महाराज की मधुर आवाज सुनने से ही हमें भी हम ही गा रहे हैं— ऐसी अनुभूति ही हमारे लिये पर्याप्त है। भजन ताल में गाना नहीं आता, फिर भी जो हर एक व्यक्ति के भीतर भजन को गाने की इच्छा होती है, वो मुझे इस पंक्ति की याद दिलाती है कि— “वेडे वाकडे गाईन, परी तुझा दास होईन।” बेचारे प्रभु कितने दिनों से इस बेसुरी आवाज को झेल रहे हैं, वो केवल उस भक्त के प्रेम हेतु। रात्री में भजन, आरती, उपदेश रत्नमाला का श्रीजी के साथ पठण, प्रसाद— यह सारी चीज़ें अत्यंत ही भक्तीमय अनुभव कराने वाली हैं। श्रीजी जब घर वापस लौटते हैं तो “कमल वदनी हे” इस पद का गायन होता है। तो दिल भर आता है कि गया आज का भी दिन गया। पर इस बावले मन को— अरे शांत हो जा, अभी तो रात भर की दिंडी भी बाकी है— ऐसा खिलौना देकर शांत करते हैं।

आखिरकार सात दिन बितने के बाद आठवें दिन की दिंडी का दिन भी आ ही जाता है। उससे भी पहले माणिक क्विज़ का आयोजन होता है। ‘खेल-खेल में जानो प्रभु को’ यह उद्देश्य सच में संप्रदाय और प्रभु के बारे में हर साल कुछ नया बता कर ही जाता है।
हमारे मन में तो ऐसे भी भ्रम हैं कि यदि किसी को सारी रचनाएं कंठस्थ हैं तो उसे सब कुछ अवगत है। पर ऐसा नहीं है। क्या मात्र रचनाएं कंठस्थ होने से हम सच में प्रभु के बारे में जान पाएंगे? यह तो वही बात हुई जैसे श्रीजी ने उनके प्रवचन में कथा बताई थी। जब एक साधु कुछ पक्षियों को सिखाने का प्रयास करता है कि शिकारी आएगा, दाना डालेगा, पर तुम्हें जाल में नहीं फंसना है। यह कंठस्थ करा लेता है और वे पक्षी भी जड़-बुद्धि यह बोलते-बोलते उस जाल में फंस जाते हैं। तो हमने भी क्या अलग किया है? हमने भी हमारे गुरु के द्वारा की गई रचना का सार समझकर— माया के जाल में मत फंसो, प्रभु को प्राप्त करो— यह उपदेश कंठस्थ कर, हमने भी जाल में छलांग तो लगाई ही है। और फिर हमें सारी रचनाएं कंठस्थ हैं— इसका अहंकार तो अलग ही है। एवं हमारे मार्तंड प्रभु भी तो कहते है कि— “मी मोठा दंभ हा हटवा। हे वय जाते अहा हा हा॥” इसका अर्थ यह नहीं कि रचनाएं कंठस्थ करना गलत है। वो तो बहुत ही अच्छी बात है कि आपको आधुनिक गानों से ज़्यादा प्रभु की रचनाएं कंठस्थ करना पसंद है, एवं मैं भी उन्हीं में से एक हूं। किंतु मैं बस यही कहना चाहती हूं कि सिर्फ रचनाएं ज्ञात हैं— इस आधार पर हम प्रभु और संप्रदाय के बारे में सब जानते हैं, इस झूठे ताज का दिखावा करने की बजाय, चलो सच में उस प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानने की कोशिश करते हैं और इस सप्ताह में सहभागी होते हैं। शरनांगत होकर, इस सकलमत के मेले में कभी आइये‌ तो सही, यहा सारे विकार नष्ट करणे वाली दुकाने प्रभु ने लगाई रखी है | बस उस दुकानदार प्रभु से सही चीज मांग लेना | वो सदैव उत्कृष्ट ही देते है | यदि हम प्रभु को जान गए तो और कुछ जानना बाकी ही नहीं रहेगा। मैं तो स्वयं से यह बात स्वीकार करना चाहूंगी कि थोड़ी-बहुत रचनाएं मुझे भी कंठस्थ हैं, पर मैं संप्रदाय और प्रभु के बारे में बहुत कम जानती हूं। जीवन में पढ़ाई समाप्त होने के बाद मेरा पहला लक्ष्य प्रभु और संप्रदाय के बारे में जानना यही होगा। माणिक क्विझ एक ऐसा आयोजन है जो हमें संप्रदाय के बारे मे बहुत जाणकारी देता है | स्क्रीन पर चैतन्यराज महाराज की मधुर ओर भावविभोर आवाज मे संप्रदाय की सारी जानकारी ग्रहण करने में बहुत ही आसानी होती है | वो हर बार कइ ऐसी बाते बताते है जो सिर्फ उस दीन ही हमने सुनी होती है | इसका सारा श्रेय चैतन्यराज महाराज को ही जाता है, जो हमें संप्रदाय के प्रति इतना आकर्षित कर रहे है |

फिर 11 बजे मार्तंड प्रभु की समाधि के समक्ष से दिंडी का आरंभ होता है, तो 12 घंटे चलने वाली दिंडी रुकती ही नहीं है। श्रीजी के करकमलों से अबीर का आनंद लेते हुए निश्चित स्थान पर निश्चित पद गाया जाता है। वो गाते-गाते कब एकदम काली रात सुबह की न सहने वाली धूप में बदल जाती है— उसका पता मुझे आज तक नहीं चला। ज़रा सोचकर देखिए— जिन पदों का अर्थ भी हमें समझ नहीं आता, फिर भी हम इतने झूम उठते हैं; तो उन्हीं पदों का श्रीजी को अर्थ समझ आता है तो वो तो कितने आनंदित होते होंगे ना! हमारे मार्तंड प्रभु कहते हैं, वो एकदम सच है— “नाही स्वर्गी, वैकुंठी हे सुख।” यह सुख केवल और केवल माणिकनगर में ही है। श्रीजी के दर्शन पाकर उनके हाथों से अबीर डलवा लेना यानी जीवन भर की चिंताओं से मुक्त होना ही है। वही अबीर थोड़ा-सा प्रसाद-रूपी घर लेकर आना और यदि कोई घर में बीमार हो तो उसे श्रद्धापूर्वक लगाना यानी सदैव प्रभु हमारे साथ हैं— ऐसा अनुभव करना ही है। मार्तंड प्रभु के समक्ष शुरू हुई दिंडी उन्हीं के समक्ष खत्म भी होती है और अंत में दिंडी का प्रसाद पाते हैं। ऐसे ही रात भर दिंडी का आनंद लेने के बाद आखिरकार फिर से घर वापस तो जाना ही पड़ता है, लेकिन हम अकेले घर वापस नहीं जाते— प्रभु का अबीर-रूपी प्रसाद और सालभर का सुखद अनुभव भी घर बांधकर ले जाते हैं।

जो कुछ मैंने लिखा है वो इसलिए नहीं कि मैं कुछ दिखावा कर सकूं। मुझे तो यह ठीक से ज्ञात है कि मैं इस जीवन में प्रभु का श्वान भरोसा के पैरों की धूल की भी बराबरी नहीं कर सकती। बस एक छोटा-सा प्रयास है कि आधुनिकता कहकर गलत आचरण करने वाली इस युवा पीढ़ी को सही मार्ग क्या है— सच में आधुनिकता किस चीज़ में है— और माणिकनगर एवं यहां के उत्सव के बारे में कुछ तो जानकारी दे सकूं, इसी लिये एक छोटा-सा प्रयास। यह मेरा सात दिन सप्ताह में सहभागी होने का अनुभव मैंने बयां करने की कोशिश की है। यदि भावविभोर होकर मैने कुछ अधिक, या कुछ गलत लिखा है, तो दिल से क्षमा चाहती हुं | और यही आनंद हम सभी को जन्मो-जन्मो तक प्राप्त हो— यही मंगल कामना श्री चरणों में करती हूं और इस लेख को विराम देती हूं।

माणिकनगर धाम

माणिक्यनगरं नाम क्षेत्रमस्ति पवित्रकं।
यत्र विशवेश्वरो देवो प्रभुरूपेण तिष्ठति।। (१.४ – माणिकनगर क्षेत्र माहात्म्य)

अर्थ: माणिकनगर नावाचे एक अत्यंत पवित्र क्षेत्र आहे. त्या क्षेत्रात प्रत्यक्ष भगवान्‌ श्री काशी विश्वेश्वर प्रभु रूपाने राहतात.

आप सभी ने शीर्षक पढ़ा है, तो निश्चित ही मैं माणिकनगर के बारे में ही कुछ तो लिख रही हूँ। सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट करना चाहती हूँ कि माणिकनगर के बारे में लिखना मेरी क्षमता से परे है, और श्री चैतन्यराज महाराज ने भी विस्तार से और सुंदर शब्दों में Glory of Maniknagar में माणिकनगर क्या है, यह स्पष्ट किया है। किंतु आज मैं अपने दोस्तों के प्रश्नों का उत्तर देना चाहती हूँ कि – “क्या माणिकनगर कहते रहती हो? हर साल तो जाती ही हो। कभी बाहर भी घूमने जाती हो क्या? सिर्फ देवदर्शन करने जाते रहते हो?”और बहुत कुछ…

यूँ कहें तो बचपन से सुनते आ रहे प्रश्नों के उत्तर देने का आज मैंने ठान ही लिया है। माणिकनगर को हमारे जीवन की, शरीर की और हर समस्या की दवाई कहना भी गलत नहीं होगा। जैसे कई लोग डिप्रेशन न हो, स्वस्थ रहें, इसलिये दवाइयाँ लेते हैं – ठीक वैसे ही हम लोगों को माणिकनगर नाम का डोस महीने-दो महीने में लेना ही पड़ता है, वरना हमारी हालत बिगड़ जाती है। आज हम इतने बड़े हो गए हैं, आधुनिक युग में पल रहे हैं, किंतु एक बार भी हमने अपने माँ-बाप से यह आग्रह नहीं किया कि हमें कहीं बाहर घूमने ले चलिए। इसके बावजूद हम हमेशा यही कहते हैं – “हमें माणिकनगर ले चलिए।”

आप हँस पड़ेंगे मेरी इस बात पर कि जब हम छोटे थे, आठवीं कक्षा से पहले तक, तब उन्होंने तो हमारी वार्षिक परीक्षा भी पोस्टपोन करवाकर हमें माणिकनगर लेकर गये हैं। कई बार तो रात 2 बजे तक दिंडी अटेंड करके सुबह 7 बजे हमने परीक्षा दी है। किंतु अब यूनिवर्सिटी में ऐसा करना संभव नहीं है, और “हमने भी अब पढ़ाई को ही प्रभु की सेवा मानकर वहीं मन लगाना शुरू किया है | पहले इतनी समझ नहीं थी कि पढ़ाई भी हम प्रभु को समर्पित करके सेवा कर सकते हैं। वो तो श्रीजी के भगवद्गीता पर प्रवचन सुनकर मालूम हुआ है कि जो भी कर्म करे, वो अगर प्रभु को समर्पित करे तो वह भी भक्ति ही कहलायेगी।पर तब ऐसा लगता था कि दुनिया के सारे पापी लोगों में से हम हैं जो जा नहीं पा रहे हैं।

पर मेरा यह भी अर्थ नहीं है कि सब छोड़कर आप माणिकनगर आ जाइए। बावजूद इसके हमारे माँ-बाप कहते हैं कि साल में एक बार तो जाइए, चाहे आप कितने ही व्यस्त क्यों न हों। आप सोच रहे होंगे कि माणिकनगर के बारे में लिखते-लिखते मैं व्यक्तिगत क्यों हो गई। किंतु मैं युवा पीढ़ी को यह बताना चाहती हूँ कि जितनी उम्र तक छुट्टियाँ मिल रही हैं, उसका उपयोग बाहर घूमने जाने की बजाय कभी माणिकनगर जाकर देखिए – वहीं के होकर रह जाएँगे आप।

चैतन्यराज महाराज के प्रवचन में सुना था और सत्य भी है कि – “प्रभूला धरता येते पण सोडता येत नाही”. और आपके साथ भी वैसे ही हो जाएगा।आज माणिकनगर के अलावा भी हमने तिरुपति, रामेश्वर, पंढरपुर, काशी, जगन्नाथ पुरी आदि अन्य देवस्थानों की यात्रा की है। किंतु जो माणिकनगर में जाकर प्रभु और श्रीजी के दर्शन का आनंद है, वह शायद ही कहीं मिल सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अन्य देवों के प्रति भेदभाव या नफरत की भावना रखते हैं। अरे, हमारे प्रभु ने तो हमें दत्त, राम, देवी, पांडुरंग, महादेव, हनुमान, व्यंकटेश, बसवेश्वर आदि सभी में खुद के और खुद में सभी देवताओं के दर्शन देकर धन्य किया है। प्रभु जानते होंगे कि मेरे बावले भक्त कहीं भी जाएँ, उन्हें मेरे बिना शांति नहीं मिलेगी। इसलिए उन्होंने इतने अवतार हमारे लिए धारण किए हैं और इसी तरह हम भक्तों की इधर-उधर घूमने की चिंता को मिटाकर केवल मेरी शरण में आने का, इतना सरल उपाय बताया है।

हमें तो प्रभु ने सकलमत संप्रदाय की सीख दी है, तो भला हम कैसे भेद कर पाएँगे? पर हम भक्तों के लिये यूँ कहना गलत तो नहीं होगा कि सारे तीर्थयात्राओं का संगम हमारे लिये माणिकनगर में ही होता है। और यदि हम भेद करेंगे, तो प्रभु के वचनों का अवमान होगा। और प्राण जाए पर प्रभु के वचनों का अनादर हम नहीं होने देंगे। यह भी सच है कि जब अन्य किसी तीर्थयात्रा पर जाकर दर्शन करते हैं, तो एक बार तो यह वाक्य निकलता ही है- “काही पण असो, माणिकनगर सारखं सुख कशातच नाही।” भेदभाव होता तो हमारे श्रीजी भी चारधाम यात्रा, काशी और अन्य धाम, तीर्थयात्राओं का आयोजन नहीं करते। वे भी तो अपने सारे शिष्यों को सारे धाम लेकर जाते ही हैं, क्योंकि जीवन में तीर्थयात्रा करने का महत्त्व अलग है -यह भी हमें हमारे प्रभु ने ही बताया है। पर यह तो हमारा प्रेम है कि हमें प्रभु और माणिकनगर के अलावा कुछ भी भाता ही नहीं है।

वेदांत सप्ताह और दत्तजयंती जैसे कार्यक्रम तो माणिकनगर की आत्मा हैं। वो हर एक कार्यक्रम – चाहे फिर राजोपचार पूजा हो, वेदांत सप्ताह की दिंडी हो, या दत्तजयंती का उत्सव हो, या कोई भी उत्सव हो। अब तो हम सभी भक्तों ने दत्तजयंती_2025 की तैयारीयाँ भी शुरू की है। मानती हूँ की हम क्या तैयारी करते हैं, किंतु वो जो छुट्टियों का बंदोबस्त करना हो, हम छात्रों की तो अलग ही परेशानी होती है। यही हमारे लेवल की तैयारियों की बात कर रही हूँ। दत्तजयंती का वो हर एक कार्यक्रम तीर्थस्नान से लेकर प्रभू दरबार तक, हर एक चीज अपने आप में ही अलग महत्व होता है।

वो प्रभू पुण्यतिथि, जहाँ हम भक्त थोडे-से व्याकुल होते हैं, क्योंकि अगर हमारे प्रभू महाराज सगुण रूप धरकर हमारे बीच होते तो कितना अच्छा होता — एक तरफ ऐसे विचार आते हैं। तो दूसरी तरफ इस मूढ़ मन को मार्तंड प्रभू की बात याद आती है — “अरे नालायक, मेरी गादी पर सदैव मैं ही विराजमान होता हूँ, तो आगे चलकर मैं नहीं रहूँगा ऐसा तुमने सोच ही कैसे लिया!” और मार्तंड प्रभू याने स्वयं प्रभू ने ही यह बात कही है। तो फिर इस मूर्ख मन को प्रभू में लगाने का प्रयास करते हैं। श्याम में प्रसाद पाकर फिर आनंदित होते हैं। फिर प्रभू द्वादशी के दिन विस्तार से राजोपचार पूजा देखने के बाद, रात में पुरण-पोली पर श्रीजी के करकमलो से घी लेने की हर एक भक्त की इच्छा हमें यह अनुभव कराती है कि जैसे एक माँ के सारे बच्चे ऐसे कह रहे हों — “माँ, मुझे खिलाओ, मुझे खिलाओ!” करके हर एक भक्त की अंतरात्मा पुकार रही हो।

वो दक्षिणा दरबार — जहाँ श्रीजी स्वयं याचक को दक्षिणा देते हैं। आज तक हमने यही देखा होगा कि शिष्य गुरु को दक्षिणा अर्पण करते हैं, पर यहाँ हमारे श्रीजी स्वयं ब्राह्मण, ब्राह्मण के बच्चे, ब्राह्मण की पत्नी, जंगम, फकीर, समस्त संस्थान के सेवक लोग — या आसान भाषा में कहें तो सभी याचक वर्ग, जो वहाँ कुछ लेने की इच्छा रखते हैं — उन सभी याचकों को दक्षिणा देकर हमारे श्रीजी तृप्त करते हैं। जो सिर्फ माणिकनगर में ही देखने को मिल सकता है।

फिर गुरुपूजन के दिन श्रीजी के हाथ से गुरुपेटी भराकर मन पुलकित हो जाता है। तो रात में श्रीजी की अमृतवाणी से कुछ बोध की बातें आत्मसात करने का प्रयास करते हैं। दत्तजयंती के दिन — तो मानो ऐसे लगता है कि साक्षात प्रभु का जन्म अभी-अभी हुआ है, और हम सब प्रभु के काल में ही हैं, प्रभु का पालना झुलाने के लिये ही आये हैं — ऐसी ही अनुभूति होती है।

किसी को भी मोहित कर देने वाला आनंदराज महाराज और चैतन्यराज महाराज का गायन। प्रभु जयंती का वो समय, जहाँ — “जो जो रे प्रभू राया पालना, माणिका लोकपालका” आरती से पूरा वातावरण प्रसन्न, भक्तिमय और उत्साह से भर उठता है। दत्तजयंती के दिन रात भर राजोपचार पूजा देखने के बाद, सुबह 6 बजे जो श्रीजी के साथ बैठकर प्रसाद पाने का जो आनंद है, वह शायद ही घर में अकेले बैठकर खाने में हो। वैसे तो भूख बड़ी लगती है, किंतु वह राजोपचार पूजा और उम्र में इतने बड़े श्रीजी, जिन्हें शुगर होने के बाद भी भूखे रह सकते हैं — तो हम हट्टे-कट्टे होकर क्यों नहीं रह सकते — यही प्रेरणा हमें प्रसाद लेने ही नहीं देती। वरना प्रसाद तो 9 बजे ही शुरू हो जाता है।

दत्तजयंती के उत्सव का दरबार — जो बड़े-बड़े लोग लज्जित हो जाएँ, उस वैभव को देखकर। उस दिन हम एक ऐसी अनुभूति कर सकते हैं, और विचार करने पर मजबूर भी होते हैं कि वो प्रभू राजा है, या संन्यासी है। भक्तों के लिये सब कुछ त्यागने वाला भी वही है, तो भक्तों के लिये सब कुछ धारण करने वाला भी वही है।

किंतु फिर चैतन्यराज महाराज की बात याद आती है — यह प्रभू का दरबार, वैभव है।वो तो राजाओं के भी राजा, राजाधिराज हैं। पर राजाओं का वैभव क्षणिक होता है , और उस प्रभू का वैभव तो अक्षय है |पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो केवल उस जरी की टोपी, वो वैभव देखकर कहते हैं कि प्रभू, श्रीजी को इसकी क्या आवश्यकता।अरे, पर प्रभू और श्रीजी को सच में इसकी जरूरत है ही नहीं।वो तो हम जैसे बावले भक्तों की इच्छा का मान रखणे के लिये इतने आभूषण उन्होंने धारण किये हैं। उस जरी की टोपी पहनने वाले, सिर के भीतर सदैव चलणे वाला ब्रह्मचिंतन देखने के लिये हमने भी तो कौन-सा सामर्थ्य, योग्यता, तपस्या, दिव्यदृष्टी प्राप्त की है?

हम तो सदैव से इस संसार में आवागमन करने वाले कीड़े ही हैं। तो सही है, हम तो इन सोने-चांदी, जरी की टोपी पर ही दृष्टि रखेंगे ना।पर प्रभू हम सब को सद्बुद्धि, दिव्यदृष्टि प्रदान करे कि हम उस प्रभू को समझ सके। अरे तुम्हे ओर कोनसा दाखला प्रभू दिखादे, श्रीजी को शुगर, इतनी आयु होणे के बावजूद, वो दरबार हो या दत्तजयंती की राजोपचार पूजा, आते है तो १३ से १४ घंटो तक न कोई शारीरिक क्रिया करते है, न कभी इतनी ठंड में कापते नजर आये है | श्रीजी के उमर के भी, या उनसे बडे लोग भी उत्सव मे सहभागी होते है, उनकी हालत कभी देखीं है क्या? और उनकी ही नहीं इतनी सी उमर है हमारी तो सिर्फ पूजा देखणे से ही हमारे पैर, कमर, आदी सभी अंगो मे दर्द होता है | वो श्रीजी रुपी प्रभू ही है जो हमे दिखा रहे है की कैसे वह शारीरिक क्रियाये, ओर मानवता से परे है | वरणा हम मूढ तो उन्हे एक सामान्य मानव ही समझने की भूल कर बैठते है| एवं संत कबीरदास जी ने भी तो हमे यही उपदेश दिया है की – “तुलसी वृक्ष न जानिये, गाय न जानिये ढोर, गुरू मनुज न जानिये, ये तिनो नंदकिशोर |”

दरबार की वह रात, जहाँ प्रभु संस्थान के सचिव श्री आनंदराज महाराज संस्थान का वार्षिक प्रतिवेदन और कुछ चार बोध की बातें बताते हैं। तो दरबार को एक नई दिशा प्राप्त होती है | वैसे तो हर एक बात व्हॉट्सऐप ग्रुप पर डाली जाती है, किंतु हर एक व्यक्ति के भीतर वह आवाज़ कानों में सुनते-सुनते प्रोजेक्टर पर देखने की इच्छा हमें उस हर एक व्यक्ति तक ले जाती है, जो सच में प्रभु संस्थान के विकास को लेकर बड़ा आनंदित होता है।

दरबार के दिन कड़ाके की ठंड में कतार में खड़े रहकर हर एक व्यक्ति के भीतर श्रीजी के दर्शन की इच्छा — जो हमें एक सच्चे भक्त तक पहुँचाती है। तो इतनी ठंड में भक्तों के लिये चाय-बिस्किट की व्यवस्था — श्रीजी का भक्तों के प्रति प्रेम दर्शाती है। उस चाय बिस्कीट को देख मुझे संत मीरा बाई की उक्ती का स्मरण होता है- “भक्त को जितने प्रभु हैं प्यारे, भक्त प्रभु को उतने दुलारे, करे भक्त का मान, भक्त प्रिये भगवान।” चाय-बिस्किट तो छोड़ो, एक-एक व्यंजनों और उसके स्वाद की बात करने बैठूंगी तो यह लेख कभी समाप्त ही न हो। किंतु जब दरबार में श्रीजी का दर्शन हो जाता है, तो एक तरफ दर्शन प्राप्त होने से मन पुलकित हो जाता है, तो दूसरी तरफ — “कल घर जाना होगा” — इस विचार से मन संतप्त हो उठता है।

पर फिर — अगले साल फिरसे आएंगे — यही आसरा उस दिन काम आता है। दरबार की सबसे विशेष बात यह है की, प्रभू महाराज उस दीन सभी को हर किसी की इच्छा अनुरूप सुख, समृद्धी से भक्तो की झोली भर देते है | और आखीर मे तुळजाभवानी के प्रसाद एवं शोभायात्रा से दरबार की समाप्ती होती है |  जो भी मैंने ऊपर दत्तजयंती महोत्सव की सारी बातें संक्षिप्त में कही हैं — वह सुनी-सुनाई नहीं हैं या कोई बड़प्पन नहीं है। अपितु स्वयं अनुभव लेकर बताई हैं। पर यूँ ही चैतन्यराज महाराज ने माणिकनगर को “कैलाश” घोषित नहीं किया है। यह अनुभव करने के लिये निश्चित ही एक बार जाकर दत्तजयंती के सारे कार्यक्रम दिल से, भक्ती से अनुभव भी करने पड़ते हैं।

माणिकनगर तो हर एक स्त्री, जो विवाहित है, उसके लिये मायके से बढ़कर है। बस खाओ-पियो और प्रभु का स्मरण करते रहो। न जल्दी उठकर खाना बनाने की चिंता, न रात को सोते समय कल सुबह की तैयारी – पर माणिकनगर में केवल और केवल बस उस स्त्री को कार्यक्रम में जाने की चिंता होती है | निश्चित ही यह अनुभव मेरा नही है, यह बात मैने मेरी माँ, चाची, बुवा और अन्य स्त्रियों से सुनी है | जब हम सभी कार्यक्रम अटेंड करके घर वापस आते हैं, तो चार दिन तो उसी खयालों में रहते हैं। वह भजन की आवाज़, जो मन में चल रही होती है, वह न तो सोने देती है, न पढ़ने देती है।  कोई भी आज की माणिकनगर की रचना देखेगा, तो वह स्वयं को बार-बार वहाँ जाने से रोक नहीं पाएगा।

कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि प्रभु ने माणिकनगर हमारे पास क्यों नहीं रखा? अगर पास होता तो और भी आसानी होती। वैसे तो बहुत पास है, लेकिन जाते समय वह भी बहुत दूर लगता है। लेकिन छोड़िए, प्रभु ने कुछ तो सोचकर और हमारी भलाई के लिए ही ऐसा किया है। यह तो मेरा प्रेम और क्रोध से प्रभु से किया गया सवाल है – इस पर आप ज़्यादा ध्यान न दें। माणिकनगर हम सभी के लिए ऐसी जगह है – चाहे सुख हो, दुख हो, परीक्षा में अच्छे अंक मिले हों, मन अस्वस्थ हो या अन्य कोई भी कारण हो हो – बस, चलो माणिकनगर ! वहाँ जाने से सब ठीक हो जाता है, और वास्तव में हो भी जाता है।

यह जो विश्वास है न, यही हमारे सुखी जीवन का असली राज़ है|  हमारे माँ-बाप तो हमें हमेशा यही याद दिलाते रहते। हैं – जीवन में कुछ भी करो, पर अगर प्रभु और प्रभु की गादी को भूलोगे, तो तुम कितना भी आगे बढ़ो, तुम्हारा अमंगल निश्चित है। रोज़ के जीवन में कोई माँ-बाप ऐसे शब्द प्रयोग नहीं करते, किंतु जब प्रभु और प्रभु के गादी के प्रति कुछ समझाना हो, तो यह पंक्ति एक बार तो हमारे घर में ज़रूर प्रयोग होती है। निश्चित ही हम इसे ध्यान रखेंगे।

लेख की सीमा और आपको पढ़ने में ज्यादा समय न लगे, इसको ध्यान में रखते हुए आज मैंने जितना हो सके, उतना बताने का प्रयास किया है कि माणिकनगर हमारे लिए क्या है और हम बार-बार वहीं क्यों जाते रहते हैं। और उस पवित्र भूमि में जाने वाले हम कौन होते हैं – वह प्रभु ही हैं जो बार-बार बुला लेते हैं। तो भला हम कैसे उस बुलावे का विद्रोह कर पाएँगे? किंतु शब्दों में इसे पूरी तरह बाँध पाना संभव नहीं है। वैसे तो मैं सिर्फ माणिकनगर के बारे में ही लिखना चाहती थी, पर दत्तजयंती आने वाली है, तो बैकग्राउंड में वही विचार चल रहे थे, इसलिए दत्तजयंती के बारे में भी कुछ ज्यादा ही लिख दिया। अगर आपकी अपेक्षाओं तक मैं नहीं पहुंच पाई, तो दिल से क्षमा चाहती हूँ। पर माणिकनगर और श्रीजी हमारे लिये केवल एक तीर्थ या इंसान नहीं, बल्कि जीवन की प्रेरणा, शक्ति और विश्वास हैं। माणिकनगर हमारे अनुभवों, आस्था और सुख-दुःख के साथी के रूप में जुड़ा हुआ है, जिसका स्थान कोई भी और किसी भी रूप में नहीं ले सकता |

श्री चैतन्यराज महाराज भी सही कहते हैं – “केवल पहुँचते हैं यहाँ सौभाग्यशाली भक्तजन”, और उनमें से एक हम भी है इसका मुझे गर्व है|